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पीढ़ी अंतराल या जनरेशन गैप की समस्या नया नहीं है। यह दो पीढ़ी के बीच सोचने विचारने और कार्य करने के तरीकों में अंतर को बताता है।
विभिन्न मुद्दों जैसे आर्थिक,राजनीतिक, सामाजिक- धार्मिक, मूल्यों आदि में दो पीढ़ी काफी अलग राय रखते हैं,,
बल्कि इसमे युवा पीढ़ी का विचार कई बार सामान्य के ठीक विपरीत और उग्र होता है।
मुख्यतः दोनो में *मनोवैज्ञानिक अंतर* ज्यादा होता है।
जैसे-
*ग़रीबी* दूर करने के लिए एक युवा, सरकार द्वारा गरीबों को सीधे पैसे बांटकर या बड़े रईसों को लूटकर गरीबो को देने की बात कह सकता है।
इसीतरह *भ्रष्टाचार* पर युवा, ऐसे काम करने वाले को गोलियों से उड़ाने या फाँसी देने का विचार रख सकता है।
वही *प्रौढ़* इन दोनों मुद्दों में गरीबी को क्रमिक विकास से दूर करने तथा भ्रष्टाचार को व्यवस्था में निचे से ऊपर तक सुधार करने की दृष्टि से देखता है।
स्पष्ट है कि युवा *तीव्र और जल्दी* परिणाम चाहता है। उसका ध्यान किसी मुद्दे के एक प्रमुख कारण पर ज्यादा होता है,,,
जैसे वह भ्रष्टाचार के लिए नेता और नौकरशाहों को दोषी मानता है,, वही आम जनता का एक बड़ा वर्ग जो इसमे सीधे या परोक्ष रूप से लिप्त होता है उसकी तरफ उसका ध्यान नहीं जाता।
अब तक आप को लग रहा होगा कि मैं युवाओं को कम और प्रौढ़ को बेहतर बता रहा हूँ,, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है।
दरअसल प्रौढ़ों की *धीमी गति* से परिणाम की ओर पहुँचने की प्रवृत्ति हमेशा लाभदायक नहीं होती...
इससे कई बार परिणाम उस सही रूप में नही प्राप्त होते जैसा कि हम चाहते थे,, या परिणाम तक पहुँचते- पहुचते उसका महत्व भी कम या खत्म हो जाता है।
ऐसे में युवाओं के द्वारा समस्या निवारण की तीव्र या अतितीव्र ललक जिसे *क्रांति* कहते है उसकी आवश्यकता होती है।
*ध्यान रखें एक प्रौढ़ कभी भी क्राँति नही कर सकता,,, वह क्रमिक सुधार कर सकता है लेकिन क्रांति नही।* क्रमिक सुधार के लिए हो सकता है वह आंदोलन का रास्ता चुने,, लेकिन क्रांति उसकी क्राइटेरिया से बाहर होता है।
और यदि कभी किसी प्रौढ़ के अंतर्गत क्रांति हो तब भी उसका प्रमुख सूत्रधार युवा ही होता है।
जैसे सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय दिल्ली में बहादुर शाह जफर नाममात्र के नेता थे।
खैर यहाँ क्रांति का मतलब यहाँ हथियार उठाने से नहीं है बल्कि *समग्र क्राँति* से है।
कारण-
जनरेशन गैप के कई कारण होते हैं,, मैं तीन मुख्य कारण मानता हूँ-
1. यह एक *स्वतः प्रवृत्ति* के समान है जिसे बदलते परिवेश में रोकना लगभग असंभव है।
2. *हार्मोनल प्रभाव* युवाओं में उसमे बहने वाली हार्मोन उसकी सोच को बहुत ज्यादा प्रभावित करती है, जिसके कारण उनमे उग्रता स्वभाविक रूप में रहता है।
3. एक किशोर से यह अपेक्षा रखना की वह युवा होते तक प्रौढ़ों के विचार को अच्छे से अपना ले ,,, यह कम सम्भव दिखाई देता है, क्योंकि इसी समय के उनके कार्य उसके आगामी जीवन की दिशा निर्धारित कर रही होती है।
यानी वह शिक्षा, रोजगार, युवावस्था के परिवर्तन और आवश्यकता से जूझ रहा होता है।अतः ऐसे समय मे यह चांस कम है कि युवा प्रौढ़ जैसा सोच पाये।*
जेनेरेशन गैप कैसे दूर करे-
बात करते है उस युवा की जो लंबे समय अंतराल में दुनिया को भलीभाँति समझते हुए आज प्रौढ़ बन गया है,,,
तब क्यो न प्रौढ़, युवाओं का विचार समझ ले और उससे सामंजस्य बैठा ले,, यह सम्भव है।
प्रौढ़ कैसे युवाओं से सामंजस्य स्थापित करे ,, इस हेतु सबसे पहले प्रौढ़ को यह *अहम* छोड़ना होगा कि *मैं बड़ा हूँ* फिर युवाओं से दोस्ती करनी होगी।
प्रौढ़ को खुद आगे बढ़कर बिना झिझक के युवाओं से मिलना होगा ,, क्योंकि *युवा सामान्यतः कभी भी अपने से होकर प्रौढ़ से सम्पर्क नही रखना चाहते,,, मजबूरी या रिश्ते की बात अलग है।*
इसके साथ ही प्रौढ़ को उनकी समस्या को जानना फिर उसके न केवल निवारण के उपाय बताना बल्कि यथा संभव उसे *दूर करने में आर्थिक, शारिरिक और मानसिक रूप भागीदार बनना होगा।*
युवाओं के *रुचि के विषय या मुद्दे* पर बारीकी से रुचि दिखानी होगी तभी युवा ,प्रौढ़ के समक्ष सहज व्यवहार करेगा।
ध्यान रहे युवाओं से जुड़ने के लिए केवल *भाषण बाजी या उपदेश* देने से काम नही होगा बल्कि जमीनी स्तर पर उसकी सहायता करनी होगी।
*मैं इस बात की गारंटी देता देता हूँ कि उक्त कार्य करने वाले प्रौढ़ का युवाओं के साथ जनरेशन गैप न के बराबर होगा।*
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि जनरेशन गैप को पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सकता है,,,
*.... लेकिन उस हद तक निश्चित रूप से कम किया जा सकता है कि उसका हानिकारक परिणाम न आये,, बल्कि आवश्यकता अनुसार क्राँति भी आ जाये।*
पोस्ट लम्बे होने का मुझे खेद है लेकिन कई बातों को छोटे पोस्ट से स्पष्ट नहीं किया जा सकता। इसे अंत तक पढ़ते हुए यदि आप टिके हुए है तो आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
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