सोमवार, 31 जनवरी 2022

आत्मविश्वास क्या है यह कैसे बढ़ता है? || What is confidence, How does it grow?

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एक विद्यार्थी यदि गणित का कोई सवाल बना लेता है तो वह जान जाता है कि यदि वह इसीतरह कोशिश करे तो आगे के भी सवाल बना लेगा,,,


क्योकि आगे के सवाल को हल करने के लिए जो आवश्यक दक्षता थी, उसे उसने पिछले चैप्टर से हासिल कर लिया है,,,


 जिसके कारण उसके मन में आगे की सम्भावना के प्रति एक सकारात्मक विश्वास पैदा होता है इस सकारात्मक विश्वास को ही *आत्मविश्वास* कहते है।






यही चीज ज्यो का त्यों पैसे के बारे में भी लागू होता है, व्यक्ति के पास जैसे- जैसे पैसा आते जाता है वह पैसे कमाने के दांव पेंच से भलीभांति वाकिफ हो रहा होता है अतः उसका विश्वास भी बढते जाता है।


साथ ही *पैसा कमाने* से व्यक्ति पैसे की ताकत को भी जान जाता है कि वह पैसे का उपयोग कर काफी सारी विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल कर लेगा अतः उसका आत्मविश्वास बढ़ जाता है।



वही पर कमजोर व्यक्तित्व वाला व्यक्ति पैसा कमाने पर आत्मविश्वास को अत्यधिक बढ़ा हुआ महसूस करता है जो कि अतिआत्मविश्वास या *ओवरकांफिडेन्स* कहलाता है।



          स्पष्ट है कि आप जिस क्षेत्र में कॉन्फिडेंट होना चाहते हैं उस क्षेत्र की बेसिक जानकारी ही आपका आत्मविश्वास बढायेगा,,


          अन्यथा आप छोटी छोटी चीजों के लिए भी दूसरों का मुँह ताकते रहेंगे।


धन्यवाद। 


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गीता और फुटबॉल पर विवेकानंद जी का विचार || Gita aur Football par vivekanand ji ke vichar

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स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि-


 ' *गीता पढ़ने के पहले दो घण्टे फुटबॉल खेलो'*


उनके कथन के पीछे उद्देश्य यह था कि जब व्यक्ति का शरीर खेल और व्यायाम के द्वारा स्वस्थ्य रहता है तब उसका दिमाग भी तीव्रता से चीजों को ग्रहण करता है।


इसलिए जब गम्भीर किस्म के बातों को समझना होता है तब आपने भी महसूस किया होगा कि हम उस समय जितना एकाग्र होते है उसे उतनी जल्दी समझ लेते हैं।


प्रस्तुत कथन में गीता पढ़ने को एक विवेकानंद जी ने एक उदाहरण के रूप में दर्शाया है,, जरूरी नही है कि आप गीता ही पढ़े।


आप अपने धर्म- पंथ या विश्वास के आधार पर कोई भी ग्रंथ पढ़ सकते हो,, या कोई दूसरे जरूरी कार्य के सम्बंध में भी इस  उदाहरण का प्रयोग कर सकते है।







निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते है कि वैसे तो हमे नियमित रूप से व्यायाम करने चाहिए ...


...लेकिन कम से कम उस अवधि में अपने तन और मन को अवश्य तन्दरुस्त रखने चाहिए जो दिन हमारे लिए बहुत ज्यादा महत्व का हो,, 


अन्यथा हमारा काम उस स्तर पर पूर्ण नही हो पायेगा जिस स्तर पर हम उसे करना या समझना चाहते थे।


धन्यवाद।।


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अंतिम नुकसान किसे होता है? || Antim nuksan kise hota hai?

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सड़क बनाने का कार्य चल रहा था,,, रोज की तरह काम समाप्त होने के बाद ड्राइवरो ने रोड रोलर, और दूसरे सड़क बनाने वाली गाड़ियों को सड़क के नीचे ला खड़ा किया।



संयोग से उस रात भारी बारिश हुई और सभी गाड़ियां वही फँस गई। ठेकेदार की जेसीबी कही दूसरे शहर में  काम मे व्यस्त था,,,



वही सड़क निर्माण कार्य अंतिम चरण में था,, जल्द काम खत्म करने थे इसलिए  आसपास के गाँवो से दर्जन भर ट्रैक्टर मंगाया गया।



ट्रैक्टर वालो ने कुछ घंटो की मशक्कत के बाद फँसे हुए सभी गाड़ियों को बाहर निकाल दिया।



सुपरवाइजर ने ट्रैक्टर वालो को भुगतान किया,, लेकिन ट्रैक्टर वाले मनमाना चार्ज वसूल रहे थे,, जो सामान्य से कई  गुना अधिक था।



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असल मे सड़क ठेकेदार के गाड़ियों को बाहर निकालने के पहले ही सभी गाँव वाले एकमत हो गये थे कि चूँकि ठेकेदार घटिया रोड बनाते है इसलिए इनसे मनमानी कीमत वसूली जाये।



अब भुगतान में विवाद बढ़ता देख सभी गाँव वाले भी ट्रैक्टर वालो के समर्थन में आ गये,, मामला बिगड़ न जाये इसलिए,,



सुपरवाइजर ने ठेकेदार को फोन लगाया , ठेकेदार ने ट्रैक्टर वालो के मन मुताबिक भुगतान देने को कहा।



भुगतान होने के बाद ट्रैक्टर वालो सहित सभी गाँव वाले जीत की खुशी में सीना फुलाते चले गए कि एक लूटेरे को उन्होंने लूट लिया।






थोड़ी देर बाद सुपरवाइजर को ठेकेदार का फोन आया जिसमे उसने निर्देश दिया कि अंतिम बचे हुए तीन किलोमीटर सड़क बनाने में जो सामग्री लगेगी उसका क्वालिटी उतने रुपये कम कर दो जितने का भुगतान ट्रैक्टर वालो को किया गया है।



यानी ठेकेदार ने ट्रैक्टर वालो के चार्ज की वसूली रोड को घटिया बनाकर कर ली।



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तातपर्य यह है कि *जितने भी घपलेबाजी के काम होते है उसमें अंतिम नुकसान आम जनता का ही होता है।



इससे कभी भी किसी नेता, ठेकेदार, अफसर, कर्मचारी या जनप्रतिनिधियों को कोई खास फर्क नहीं पड़ता।



जैसे -

       स्वास्थ्य विभाग में घपले से अंतिम नुकसान *मरीजो* को, शिक्षा विभाग में अन्तिम नुकसान *बच्चों* को, राजस्व व पंचायत विभाग में अंतिम नुकसान *किसानों और गरीबों* को होता है।



 *इस प्रसंग में भी अंतिम नुकसान गाँव की आम जनता को हुआ* क्योंकि घटिया क्वालिटी से बनी सड़क जो पहले चार पांच सालों में खराब होती थी,,,

...............वह *इस बार साल डेढ़ साल में खराब हो गई।* 



धन्यवाद।।


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जेनेरेशन गैप क्या है, कैसे दूर करे ? || Generation gap kya hai, kaise door kre?

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पीढ़ी अंतराल या जनरेशन गैप की समस्या नया नहीं है। यह दो पीढ़ी के बीच सोचने विचारने और कार्य करने के तरीकों में अंतर को बताता है।



विभिन्न मुद्दों जैसे आर्थिक,राजनीतिक, सामाजिक- धार्मिक, मूल्यों आदि में दो पीढ़ी काफी अलग राय रखते हैं,,



 बल्कि इसमे युवा पीढ़ी का विचार कई बार सामान्य के ठीक विपरीत और उग्र होता है।



मुख्यतः दोनो में *मनोवैज्ञानिक अंतर* ज्यादा होता है।



जैसे- 


         *ग़रीबी* दूर करने के लिए एक युवा, सरकार द्वारा गरीबों को सीधे पैसे बांटकर या बड़े रईसों को लूटकर गरीबो को देने की बात कह सकता है।



इसीतरह *भ्रष्टाचार* पर युवा, ऐसे काम करने वाले को गोलियों से उड़ाने या फाँसी देने का विचार रख सकता है।



वही *प्रौढ़* इन दोनों मुद्दों में गरीबी को क्रमिक विकास से दूर करने तथा भ्रष्टाचार को व्यवस्था में निचे से ऊपर तक सुधार करने की दृष्टि से देखता है।



स्पष्ट है कि युवा *तीव्र और जल्दी* परिणाम चाहता है। उसका ध्यान किसी मुद्दे के एक प्रमुख कारण पर ज्यादा होता है,,,



जैसे वह भ्रष्टाचार के लिए नेता और नौकरशाहों को दोषी मानता है,, वही आम जनता का एक बड़ा वर्ग जो इसमे सीधे या परोक्ष रूप से लिप्त होता है उसकी तरफ उसका ध्यान नहीं  जाता।



अब तक आप को लग रहा होगा कि मैं युवाओं को कम और प्रौढ़ को बेहतर बता रहा हूँ,, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है।






दरअसल प्रौढ़ों की *धीमी गति* से परिणाम की ओर पहुँचने की प्रवृत्ति हमेशा लाभदायक नहीं होती...



इससे कई बार परिणाम उस सही रूप में नही प्राप्त होते जैसा कि हम चाहते थे,, या परिणाम तक पहुँचते- पहुचते उसका महत्व भी कम या खत्म हो जाता है।



ऐसे में युवाओं के द्वारा समस्या निवारण की तीव्र या अतितीव्र ललक जिसे *क्रांति* कहते है उसकी आवश्यकता होती है।



 *ध्यान रखें एक प्रौढ़ कभी भी क्राँति नही कर सकता,,, वह क्रमिक सुधार कर सकता है लेकिन क्रांति नही।*  क्रमिक सुधार के लिए हो सकता है वह आंदोलन का रास्ता चुने,, लेकिन क्रांति उसकी क्राइटेरिया से बाहर होता है। 


और यदि कभी किसी प्रौढ़ के अंतर्गत क्रांति हो तब भी उसका प्रमुख सूत्रधार युवा ही होता है।



जैसे सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय दिल्ली में बहादुर शाह जफर नाममात्र के नेता थे।



खैर यहाँ क्रांति का मतलब यहाँ हथियार उठाने से नहीं है बल्कि *समग्र क्राँति* से है।




कारण-


जनरेशन गैप के कई कारण होते हैं,, मैं तीन मुख्य कारण मानता हूँ-



1. यह एक *स्वतः प्रवृत्ति* के समान है जिसे बदलते परिवेश में रोकना लगभग असंभव है।



2.  *हार्मोनल प्रभाव* युवाओं में उसमे बहने वाली हार्मोन उसकी सोच को बहुत ज्यादा प्रभावित करती है, जिसके कारण उनमे उग्रता स्वभाविक रूप में रहता है।



3. एक किशोर से यह अपेक्षा रखना की वह युवा होते तक प्रौढ़ों के विचार को अच्छे से अपना ले ,,, यह कम सम्भव दिखाई देता है, क्योंकि इसी समय के उनके कार्य उसके आगामी जीवन की दिशा निर्धारित कर रही होती है।


यानी वह शिक्षा, रोजगार, युवावस्था के परिवर्तन और आवश्यकता से जूझ रहा होता है।अतः ऐसे समय मे यह चांस कम है कि युवा प्रौढ़ जैसा सोच पाये।* 




जेनेरेशन गैप कैसे दूर करे-


बात करते है उस युवा की जो लंबे समय अंतराल में दुनिया को भलीभाँति समझते हुए आज प्रौढ़ बन गया है,,,


तब क्यो न प्रौढ़, युवाओं का विचार समझ ले और उससे सामंजस्य बैठा ले,, यह सम्भव है।


प्रौढ़ कैसे युवाओं से सामंजस्य स्थापित करे ,, इस हेतु सबसे पहले प्रौढ़ को यह *अहम* छोड़ना होगा कि *मैं बड़ा हूँ* फिर युवाओं से दोस्ती करनी होगी।


प्रौढ़ को खुद आगे बढ़कर बिना झिझक के युवाओं से मिलना होगा ,, क्योंकि *युवा सामान्यतः कभी भी अपने से होकर प्रौढ़ से सम्पर्क नही रखना चाहते,,, मजबूरी या रिश्ते की बात अलग है।* 


इसके साथ ही प्रौढ़ को उनकी समस्या को जानना फिर उसके न केवल निवारण के उपाय बताना बल्कि यथा संभव उसे *दूर करने में आर्थिक, शारिरिक और मानसिक रूप भागीदार बनना होगा।* 


युवाओं के *रुचि के विषय या मुद्दे* पर बारीकी से रुचि दिखानी होगी तभी युवा ,प्रौढ़ के समक्ष सहज व्यवहार करेगा।


ध्यान रहे युवाओं से जुड़ने के लिए केवल *भाषण बाजी या उपदेश* देने से काम नही होगा बल्कि जमीनी स्तर पर उसकी सहायता करनी होगी।


 *मैं इस बात की गारंटी देता देता हूँ कि उक्त कार्य करने वाले प्रौढ़ का युवाओं के साथ जनरेशन गैप न के बराबर होगा।* 




कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि जनरेशन गैप को पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सकता है,,,


 *.... लेकिन उस हद तक निश्चित रूप से कम किया जा सकता है कि उसका हानिकारक परिणाम न आये,, बल्कि आवश्यकता अनुसार क्राँति भी आ जाये।*




पोस्ट लम्बे होने का मुझे खेद है लेकिन कई बातों को छोटे पोस्ट से स्पष्ट नहीं किया जा सकता। इसे अंत तक पढ़ते हुए यदि आप टिके हुए है तो आपका बहुत बहुत धन्यवाद।



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क्या मोगली की कहानी सच है? || Kya Mowgli ki kahani sach hai?

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देखिए मोगली का तो मुझे पता नही लेकिन जो सच है मैं उसे बता रहा हूँ-



एक दिन मैं शाम को टहलने गाँव के बाहर गया था,, 


वापसी के समय,


भेड़ो की झुंड सामने आ गई,,



मैंने सोचा इस झुंड को जाने दो फिर मैं बाद में चला जाऊंगा,,,,ताकि धूल धक्कड़ से बच जाऊ।



यह विचार कर मैं पास के शनिमंदिर में चला गया ।


क्या मोगली की कहानी सच है? || Kya Mowgli ki kahani sach hai?



चूंकि भेड़ काफी धीमे चल रहे थे इसलिए अभी भी वे मुझसे कोई खास दूर नही गये थे।


अब मैंने जल्दी -जल्दी चलकर उसे क्रॉस करने की ठानी तभी मैंने देखा कि...


भेड़ो के झुंड के आगे एक बकरी चल रही है।



मैंने इस बारे में चरवाहे से पूछा जो कि मेरा पड़ोसी है उसने बताया कि --



" उस बकरी को जन्म देने वाली बकरी यानि उसकी माता उसके जन्म के बाद गुजर गई जिसके बाद वह भेड़ का दूध पीकर बड़ा हुआ"


इसलिए वह भेड़ की टोली के साथ रहता है,, वह इकलौती बकरी है जो उस टोली के साथ चलती है।


मजेदार बात यह है कि वह अब बड़ा होने के बाद भी बकरियों की टोली के साथ चरने नही जाता ।



खैर कुछ लोग कह सकते है कि भेड़ और बकरी लगभग समान प्रजाति, आदत, खानपान, प्रवृत्ति के जानवर है।



इसलिए वह बकरी, इन भेड़ो के साथ है ,, मोगली और वुल्फ से उसकी तुलना नहीं हो सकती।



बात एकदम सही है, लेकिन दूसरे व्यू से देखे तो समान प्रजाति के होने के बाद भी इंसान ही इंसान का दुश्मन बना बैठा है,,,


तब इन भेड़- बकरियों की आपसी लगाव और आत्मीयता से सबक लेने में क्या बुराई है?



धन्यवाद।।


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शनिवार, 22 जनवरी 2022

तकनीकी ज्ञान कितना आवश्यक है || Technology kitna aavshyak hai

 युद्ध का समय निकट था,


काफी लंबे समय से अस्त्र के अभाव से जूझ रही सेना के लिए सैकड़ो लोहार और उनके सहयोगी हथियार बनाने में जुटे थे।


राजा की आज्ञा थी, अतः काम दिन- रात धडल्ले से चल रहा था,,


लोहार धौकनी से भट्ठे में कोयला दगाता , लोहे को गर्म कर तलवार बनाता पानी में डुबाकर ठंडे करता।


अंततः लोहारो का काम पूरा हुआ और हथियार सेना को सौप दी गई।






वैसे दुश्मन सेना छोटी थी इसलिए उत्साह से भरी राजा की सेना शत्रुओं पर टूट पड़ी।


लेकिन थोड़े ही अंतराल में राजा की सेना हर जगह एक- एक करके हारने लगी।


हार से राजा को नगर छोड़कर भागना पड़ा और पड़ोसी मित्र राज्य में शरण लेनी पड़ी।


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बाद में राजा ने ठंडे दिमाग से हार के कारणों की समीक्षा की और उसमें कमी-बेशी को दुरुस्त किया।


फिर राजा ने मित्र राज्य के सहयोग से अपने राज्य में आक्रामण कर दुश्मन को परास्त कर दिया और पुनः सत्ता प्राप्त कर लिया।


क्या कारण था कि राजा पहले के युद्ध में हार गया था और बाद में किस चीज मे सुधार किया जिससे वह जीत गया। 

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दरअसल सेना के लिए हथियार जल्द बाजी में बनाया गया था,,, 


हथियार बनाने में तकनीकी खामी थी,


...समय की कमी के कारण लोहार हथियार बनाने के दौरान उसे अपने आप ठंडा नही कर सीधे पानी मे डुबाकर ठंडा करते जिससे सभी हथियार कमजोर बने थे।



यही कारण था कि लड़ाई के दौरान अधिकतर सैनिकों के हथियार टूट गए और उनकी हार हुई।



 *सार यह है कि राजा के समान बड़ी सेना,अनुभव, धन,रणनीति, उत्साह इत्यादि से ही आप युद्ध रूपी भंवर से पार नही हो सकते साथ में आपको बेहतर तकनीकी ज्ञान की भी आवश्यकता होती है।*


धन्यवाद। 


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शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

पूर्वाग्रह || Prejudice

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किसी व्यक्ति, वस्तु या विषय के बारे में पहले से ही राय /जजमेंट बना लेना की वह बुरा है या अच्छा है,,,, यह पूर्वाग्रह कहलाता है।


मान लो A यदि B को बिना अच्छे से जाने उसके बारे में पहले से ही राय या मत बना चुका है कि B घमंडी है, तो B में लाख अच्छाइयां हो, उसे  A  मित्र के रूप में कभी स्वीकार नही करेगा। 


पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यक्ति को पूर्वाग्रही कहते है। पूर्वाग्रही का मन मिथको को सही मानता है ,,,  काफी लोग इन मिथको के जाल में फंसे होते है। 


आइये चित्र में देखते है कि लोग  पूर्वाग्रहों में लिप्त होते है -








पूर्वाग्रह हमे नई राह नए पथ में जाने से भी रोकती है क्योंकि उसके बारे में हम पहले ही भ्रमपूर्ण मत बना चुके होते हैं।


कई बार नए राह में जाना जब बहुत आवश्यक हो जाता है तब हमारा आत्मविश्वास उस राह की द्वार को खोलना चाहता है लेकिन पूर्वाग्रह उसे बन्द रखना चाहता है।


 कृपया संलग्न चित्र देखे।





दरअसल पूर्वाग्रह पहले से मन बसे पूर्व आधार रहित ज्ञान से निर्मित डर ,संकोच, झिझक के कारण नई राह से दूर रहना चाहता है ,,वही आत्मविश्वास आपकी पॉज़िटिवनेस से ही उद्दीप्त होती है।



सार यह है जिस व्यक्ति में जो चीज ज्यादा होती है वह उसी के अनुसार ढल जाता है।


अर्थात आत्मविश्वास से युक्त व्यक्ति नित नई राह -नई मंजिल -नए विचार की ओर बढ़ता जाता है,,,, 



,,,,,वही पूर्वाग्रही व्यक्ति संकीर्ण विचारधारा से अपने राह और अपनी जिंदगी को सीमित कर लेता है। फिर वह जहाँ था वही खड़ा रह जाता है।


धन्यवाद।।


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मेडिटेशन || Meditation

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शरीर का केवल *30% टॉक्सिन* पसीना,मैल, पेशाब इत्यादि से बाहर निकलता है,,


इसे बाहर करने लिए हम नित्य कर्म, स्नान, व्यायाम आदि करते है।



ये तो बात हुई *शारिरिक टॉक्सिन* की लेकिन *असली तो मानसिक टॉक्सिन होता है* ,,


जो कुल *टॉक्सिन का 70%* है इसे दूर करने के लिए मेडिटेशन किया जाता है।



शरीरिक टॉक्सिन की अपेक्षा मानसिक टॉक्सिन बहुत ज्यादा हानिकारक है, इसके दुष्प्रभाव से चिड़चिड़ा, गुस्सा, ईर्ष्या, तनाव, लालच, घमंड और कई बीमारियां हो जाती है।


यदि कोई यह दावा करता है कि उसे *व्यायाम* की इसलिए आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह अपने कार्य के द्वारा नियमित रूप से *शारिरिक श्रम* करता है तो उसका टॉक्सिन बाहर हो जाता है।


तो उसकी बात को सही मानी जा सकती है,,,






लेकिन यदि कोई यह दावा करे कि उसे *मेडिटेशन* की भी आवश्यकता नहीं है तो वह गलत कह रहा है,


..क्योंकि *करोड़ों में कोई एकाध ही ऐसा होता है जो अपनी जिंदगी में दुःख, घृणा, ईर्ष्या, लालच, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, घमंड इत्यादि से पूर्णतः बचते हुए कोई भी तनाव नही लेता और अपनी जिंदगी बहुत अच्छे से जी लेता है।* 


अर्थात हर आम आदमी में उक्त दुर्गुण होता ही है,, केवल उसकी मात्रा कम- ज्यादा हो सकती है।


अतः प्रत्येक आदमी को मेडिटेशन की आवश्यकता है।



यदि किसी को मेडिटेशन से इसलिए आपत्ति है कि वह *हिंदूइस्म के योग* से सम्बंधित है ....


...तो मैं बताना चाहता हूं कि *मेडिटेशन का उल्लेख जैन , बौद्ध, मुस्लिम (सूफी), सिक्ख, ईसाइयत में भी है। उसमें मेडिटेशन का नाम, प्रकार, तरीके या ढंग में अंतर हो सकता है।



हाँ इतना जरूर है कि हिंदूइस्म के योग के कारण मेडिटेशन विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हुआ।


वही हिंदू धर्म के अंतर्गत आने वाले अलग- अलग जाति सम्प्रदाय में भी मेडिटेशन की अलग अलग विधियाँ बताई गई है।



 *मेडिटेशन में भगवान की आराधना करना जरूरी नहीं है बल्कि इसमें मन की एकाग्रता और मजबूती का महत्व है।* 


यही कारण है कि मेडिटेशन न केवल आस्तिक बल्कि नास्तिक धर्मों जैसे बौद्ध इत्यादि में भी बेहद प्रसिद्ध रहा है।



कुलमिलाकर यदि आपको वास्तव में टॉक्सिन की बड़ी मात्रा को दूर कर खुश रहना है, तो बेधड़क मेडिटेशन कीजिए।


 *निःसंकोच होकर जाति धर्म की परवाह किए बगैर मेडिटेशन करे ,,* 


 *,,,देखना आप निश्चित ही खुश और प्रसन्न रहेंगे।* 


धन्यवाद।।


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सलूक || Salook

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वायुयान की खोज कर इंसान ने पक्षियों को हवा में मात दे दी।


वही मोटर-गाड़ी की खोज ने जमीन में हिरण, चीता जैसे जंगली जानवरों को मात दे दी।


स्टीमर-पनडुब्बी से पानी मे मछलियों को मात दे दी गई।



इसके बाद..


जिंदगी की दौड़ में जीव जंतुओं को पीछे छोड़ने के बाद इंसान ने इनका परवाह करना बंद कर दिया और इसे नष्ट करना शुरू किया,,








यही हाल मानव समाज के अंदर भी है,,,


पैसा कमाने की रेस में अमीरों ने गरीबों को हरा दिया है,


अतः अब पूंजीपति वर्ग, मजदूर वर्ग की परवाह क्यो करे??



खैर महत्वपूर्ण प्रश्न यह नही है कि किसने किसको हरा दिया,,


बल्कि *असल प्रश्न यह है पैसे कमाने की अंधाधुन रेस में अब हारे हुए लोगों के साथ भी ,,, क्या वही सलूक होगा जो इंसानों ने जानवरों के साथ किया था।* 



सोचनीय प्रश्न है  ???🤔🤔🤔


धन्यवाद


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

ओवररेटेड अन्डररेटेड || Overrated underrated

                            🔵🔵🔵  ओवररेटेड  🔵🔵🔵



कोई चीज जितना महत्वपूर्ण है उसे उससे कही ज्यादा महत्वपूर्ण मानना ओवररेटेड कहलाता है।



आसान शब्दों में कहे तो *किसी को जरूरत से ज्यादा भाव देना ओवररेटेड है * 



जैसे- 


          इंसान के लिए हवा, पानी, भोजन ज्यादा जरूरी है लेकिन वह कपड़ें, जूते, फैशन को ज्यादा महत्व देता है।



इसीप्रकार एक व्यक्ति के लिए उसका  परिवार अत्यंत महत्वपूर्ण है ,,जो उसकी सबसे ज्यादा सहायता करता है, 24 घण्टे सहायता हेतु उपलब्ध, सुख दुःख, आपदा में परिवार से ज्यादा कोई काम नहीं आता,,,  लेकिन व्यक्ति *दोस्त यार को ज्यादा भाव देता है।* 



अर्थात किसी महत्वपूर्ण चीज की अपेक्षा कम महत्वपूर्ण वस्तु को ज्यादा महत्व देने से ओवररेटेड नामक शब्द का जन्म होता है। 



फिर इस ओवररेटेड का तत्कालिक हानिकारक प्रभाव क्या होता है आप चित्र से समझ सकते है। 







                                           🟢🟢🟢अंडररेटेड 🟢🟢🟢



यह ओवररेटेड का ठीक उल्टा है।


यानी किसी वस्तु को उसकी क्षमता की अपेक्षा कम या बहुत कम महत्व दिया जाना अंडररेटेड कहलाता है।


जैसे-


      *विश्व का मोस्ट अंडररेटेड वस्तु जंगल है*  इसके ऊपर हमेशा फैक्ट्री, रोजगार, बढ़ती जनसंख्या और पूंजीवाद को प्राथमिकता दी जाती है।



वैसे ओवररेटेड और अंडररेटेड क्या है?  सभी लोग जानते है लेकिन प्रस्तुत लेख में इसे कुछ उदाहरण के द्वारा ज्यादा सरल ढंग स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।


उम्मीद है कि आप सभी को पसंद आये, 


धन्यवाद।।


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टर्निंग प्वाइंट || Turning point

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एक शिष्य आश्रम में रहता था,


जहाँ रहने वाले दूसरे शिष्य परिश्रमी थे वही यह शिष्य आलसी था।


वह सदैव धनवान बनने के सपने देखा करता था लेकिन उस मुताबिक न ज्ञान ग्रहण करता न श्रम करता।





किसी अज्ञात व्यक्ति की एक कहावत है कि--


 " जीवन में हर किसी को कम से कम एक बार अपने सपने पूरे करने का अवसर अवश्य मिलता है "



इसी तारतम्य में आलसी शिष्य को भी धनवान बनने का अवसर मिलता है।


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एक दिन जंगल में वह अपने साथियों के साथ वन्य औषधी के लिए गया था, तभी उसे सोने के सिक्कों से भरा पेटी मिला।


खुश होता हुआ वह पेटी उठाकर चलने लगा,,, लेकिन शीघ्र ही वह थक गया।


फिर वह सोचता है कि बाद में बैलगाड़ी लेकर आएगा और पेटी ले जाएगा।


इसलिए पास ही में गड्ढा खोदकर उसमे पेटी छुपाकर चला जाता है।


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लेकिन बाद में जब बैलगाड़ी लेकर पेटी लेने आता है तो पेटी वहां से गायब थी,, शायद किसी ने पेटी छुपाते देख लिया था।


अब वह शिष्य सिर पकड़कर पश्चताप करने लगता है।







यहाँ पर शिष्य ने सोने से भरी पेटी सिर्फ इसलिए गंवा दी क्योंकि आलस्य के कारण शरीरिक श्रम न करने से उसमे बोझा ढोने की क्षमता नही थी,, जबकि अन्य शिष्य आसानी से उस पेटी के वजन से ज्यादा बोझा ढो लेते थे।



सार यह है कि-   "किसी व्यक्ति को अपने जीवन में बदलाव लाने वाले सबसे बड़े टर्निंग प्वाइंट पर भूलकर भी आलसय नहीं करनी चाहिए "


धन्यवाद 


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आध्यात्मिक नवाचार || Spiritual innovation

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9 नवम्बर 2019 को *अयोध्या वर्डिक्ट* आने के बाद मंदिर निर्माण के लिए तेजी से चन्दा इकट्ठा किया जाने लगा।


          चन्दा इकट्ठा करने के प्रचलित माध्यमों के अलावा इस बार भजन कीर्तन, गायन, जुलूस इत्यादि के द्वारा भी चन्दा इकट्ठा किया जाने लगा।



            इसी तारतम्य में ग्राम *चिखली* में भी लगभग 2 वर्ष पहले 10-15 लोंगो की टोली प्रतिदिन प्रातः 5 -6 बजे ग्राम भ्रमण कर भजन गीत गाते हुए धन एकत्र करती जिसे बाद में अयोध्या भेज दिया गया।






            कुछ माह में चन्दा एकत्रित करने का कार्य समाप्त होने के बाद जहां अधिकांश जगह में भ्रमण बंद कर दिया गया है,,


        ..वही चिखली में अब भी ये लोग रोज निःस्वार्थ टोली निकाल रहे है।



           टोली गाँव के लोगों से ही बनी है,, करीब 40 - 50 लोग अलग अलग समय में इससे जुड़ चुके हैं। लेकिन टोली 10 से 15 लोग ही निकालते हैं।


           एक तरह से देखा जाये तो इन लोगो ने आरम्भ में भले चन्दा एकत्र करने के लिए टोली बनाई हो,,,


... लेकिन बाद में *स्वप्रेरित* होकर निशुल्क रोज सुबह ग्रामभ्रमण कर *चिखली का माहौल खुशनुमा* बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।


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         जैसा कि कहा गया है कि सुबह का समय यदि अच्छा गुजरे तो पूरा दिन अच्छा गुजरने की काफी सम्भावना होती है।


          *आज के समय में आध्यात्म की गिरती स्थिति और कोलाहल के बीच खुशियां बांटने का यह नवाचार या नवीन प्रयास निश्चित ही सराहनीय है।* 


           इन सभी बन्धुओं को बधाई देते हुए इनका दिल से अभिनन्दन करता हूँ,, इन्हें साधुवाद।।


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मंगलवार, 18 जनवरी 2022

सहअस्तित्व || Coexistence

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लुटेरों से तंग आकर इस बार सेना को भेजा गया। इन लुटेरों ने ऐसे किले पर कब्ज़ा कर लिया था जो देश की महत्त्वपूर्ण  व्यापारिक मार्ग को नियंत्रित करता था,, अतः लूटमार अचानक ही बढ़ गई थी



सेना जब किले की ओर जा रही थी, तब उन्हें किसानों की एक टोली मिली जो भूख प्यास से बेहाल थे। उन्होंने सेना के कमांडर से मदद मांगी की उन्हें भी किले तक ले चले क्योकि वे अब पैदल चलने में असमर्थ है।



कमांडर ने उन्हें साथ लिया और कुछ घोड़ो में उसकी टोली को बैठाकर किले तक ले आया।



किले पर हमले के पहले कमांडर ने अपने जासूसों को अंदर जाकर सामरिक जानकारी लाने को कहा।


लेकिन सभी जासूस पकड़े गए क्योंकि पहरेदारो को उनकी शरीरिक कद काठी तलवार जैसे अस्त्र शस्त्र चलाने वाले हाथों की अच्छी पहचान थी।



निराश कमांडर ने अब किसानों से सहायता मांगी ,, किसान किले के अंदर गये कुछ दिनों के बाद वे लूटेरो की सेना , हथियार , स्थिति के बारे में जानकारी लेकर आये फिर कमांडर ने किले पर हमला कर उसे जीत लिया।


 





                अब किले के अधिकार क्षेत्र में आने वाली समस्त कृषि भूमि किसानों की टोली को सौप दी गई क्योंकि लूटेरे तो केवल लूटमार करते थे कृषि नही करते,, जिससे जमीन बंजर हो गई थी।


खैर कुछ ही समय बाद पूरे क्षेत्र में कमांडर ने शांति कायम कर दी वही किसानों ने भी बंजर भूमि को हरा कर दिया।



 *यह कहानी हमे सह अस्तित्व के उस सिध्दांत को बताती है जिसके अनुसार एक दूसरे की सहायता और सहयोग से  अलग अलग कार्य प्रकृति वाले या जाति, धर्म, नस्ल, भाषा इत्यादि के लोग भी हँसी खुशी रह सकते है।* 


जैसे हम 25 दिसंबर को हम क्रिसमस, अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन एक साथ मना सकते है। बिना किसी पर्व का विरोध किये,, साथ ही तुलसी पूजन जैसे पर्व भी मना सकते है।


निष्कर्ष यह है कि -


 *खुद के त्योहार, पर्व, धर्म को बड़ा बताने के लिए दूसरे को छोटा बताने वाले विचार का हमे त्याग करना होगा,,, यही सच्चा सहअस्तित्व को दर्शाता है ।



धन्यवाद।।


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बुलबुला || Bubble

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पिछले दिनों कोविड के फैलाव के कारण एक शब्द ‘ *Bubble* ’ बहुत चर्चित हुआ। हिंदी में उसे ‘बुलबुला’ कह सकते हैं।


एक ही प्रकार के उद्देश्य साधने वाले कुछ लोगों या परिवारों ने कोविड की सावधानियाँ रखते हुए,,, बाक़ी दुनिया से सभी प्रकार की वांछित दूरी रखते हुए, छोटे -छोटे समूह बना लिए और समुचित सावधानियों के साथ आपस में मेल मिलाप और सहयोग जारी रखा...


 ...ऐसे समूहों को Bubble या बुलबुला कहा जाता है।







अपने जीवन काल में इंसान जाने-अनजाने निम्नलिखित प्रकार के अनेकों बुलबुलों का हिस्सा बनता रहता है।


 उदाहरणार्थ, मैं जिन बुलबुलों का हिस्सा हूँ उनमें से कुछ निम्न लिखित हैं :-


🔵 मेरा परिवार के सदस्य,


🔵 मेरी मित्र मंडली,


🔵  मेरे ऑफ़िस के लोग,


🔵 मेरे जैसे व्यवसायी,


🔵  मेरे WhatsApp ग्रुप के सदस्य,


🔵  मेरे आस-पड़ोस के लोग,


🔵 मेरे हम-वतन,


🔵 मेरी दुनिया के लोग,


आदि, आदि।


राग-द्वेष के प्रकरण को अपने जीवन के अनुभवों से जोड़ता हूँ तो पाता हूँ कि हमें राग और द्वेष उन्हीं लोगों से या वस्तुओं से होता है जो उस बुलबुले (Bubble) के अंदर हैं जिसमें मैं हूँ।


बुलबुले के बाहर क्या हो रहा है, उसकी जानकारी होते हुए भी मेरा राग-द्वेष नहीं उभरता,,, क्योंकि मुझे उनसे कोई सरोकार या अपेक्षा नहीं होती। अपने बुलबुले के सदस्यों से मुझे कोई न कोई अपेक्षा होती है।


दर असल जैसे ही हम किसी से कोई अपेक्षा रखते हैं, वह हमारे किसी न किसी बुलबुले का हिस्सा बन जाता है और हमारे राग या द्वेष का पात्र भी बन जाता है।


अपेक्षा की पूर्ति होती रहे तो राग (प्रेम, स्नेह, दोस्ती, प्रशंसा, आसक्ति आदि) बना रहता है और अपेक्षा पूर्ति न हो तो द्वेष (वैर भाव, घृणा, नफ़रत, ईर्ष्या, चिढ़ आदि) उत्पन्न हो जाता है।


मेरे बुलबुले के लोग मेरे लिए बदलने वाले नहीं हैं; परंतु निरंतर प्रयत्न करने पर मैं स्वयं को बदल सकता हूँ और अपने राग-द्वेष को नियंत्रित कर सकता हूँ।


इसके लिए मुझे उनसे उतनी ही अपेक्षा रखनी है जितनी अपेक्षा मैं बुलबुले से बाहर के लोगों से रखता हूँ जो कि नही के बराबर  है। 


अर्थात *निरालंबी* बनना है।


धन्यवाद।।


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केजीएफ मूवी रिव्यू || KGF movie review

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आखिरकार मैंने बहुचर्चित मूवी केजीएफ-1 देखी,


 KGF= कोलार गोल्ड फील्ड,, 


यह सन 2018 में रिलीज़, निर्देशक *प्रशांत नील* की मूलतः कन्नड़ भाषी फ़िल्म है जो अपनी तरह का एक अनोखा फ़िल्म है।


इस पूरे फ़िल्म को *नरेटर* (कथावाचक/सूत्रधार ) के बैकग्राउंड आवाज अर्थात वॉइस ओवर के माध्यम से दिखाया गया है।






फ़िल्म की कहानी साधारण है,, मुख्यतः *गुंडा ओरिएंटेड* फ़िल्म है, जिसमें निगेटिव शेड का अभिनेता अंत मे मसीहा जैसा बन जाता है।


लेकिन फ़िल्म का *स्क्रिप्ट और डायरेक्शन* यानी दिखाने का तरीका इतना शानदार है कि एक बार फ़िल्म देखना आरम्भ करने के बाद शायद ही कोई फ़िल्म को बीच में छोड़ना चाहेगा।


फ़िल्म *कर्नाटक कोलार में स्थिति भारत के सबसे बड़े स्वर्ण खदान* को केंद्र में रखकर वहाँ मजदूरों पर किये गये अत्याचार और माइंस माफियाओं के उठापटक पर आधारित है।



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जहां तक अभिनय की बात करे तो अभिनेता *यश* का दमदार एक्टिंग और बेहतरीन लुक ने कुछ ही समय उसे *बाहुबली के प्रभास* के समकक्ष ला खड़ा किया है।



लेकिन मैं यश की तुलना *थ्री हंड्रेड* के *जेरार्ड बटलर* से करना चाहूंगा, क्योंकि इस एकमात्र फ़िल्म ने यश को एक चॉकलेटी हीरो से सीधे गम्भीर अभिनेताओं के उच्च स्तर पर ले आया है।


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मूवी में कोई कमी है तो वह यह है कि कहानी कब सन 1951,1962, 1978, 1982, 2018 में जा रहा है, पता ही नहीं चलता। यानी अलग अलग *टाइम लाइन* में कौन सी घटना कब हुई, इस हेतु फ़िल्म को काफी ध्यान से देखने की जरूरत है।



वही इसमे काफी सारे विलेन भी है जिसके कैरेक्टर का नाम याद रखे बिना फ़िल्म आपको समझ में नही आएगी।


ओवरऑल फ़िल्म अच्छी है और *नये प्रयोग के लिए फ़िल्म मेकर्स प्रशंसा के पात्र है।* 


धन्यवाद।।


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ब्लैक मैजिक के पीछे का सच || black magic ke pichhe ka sach?

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एक तरफ जहाँ ब्लैक मैजिक, नजर लगना जैसे चीजो को साइंस अंधविश्वास मानकर सीधे खारिज करती है, वही योग इस पर रिसर्च करती है।



वैसे साइंस की कई शाखाएं भी ऐसा रिसर्च करने लगी है जिसे *डिस्कवरी या नेशनल जियोग्राफी* में देख सकते हैं।


लेकिन इनके रिसर्च के परिणाम काफी उलझन भरे हैं, वही योग इस मामले में काफी क्लियर दिखाई देता है।



योग पूरे जगत को ऊर्जा से निर्मित मानता है ,, जिसमे *डिस्ट्रक्टिव और क्रिएटिव ऊर्जा* दोनो है।



डिस्ट्रक्टिव के अंतर्गत अंधविश्वास के तत्व आते है, जो किसी को हानि पहुंचाने के उद्देश्य से बनाई जाती है।





इसी हानि से बचाने में क्रिएटिव एनर्जी की प्रयोग का दिखावा करके बैगा, तांत्रिक, ओझा इत्यादि आम लोगो को लूटते है।


जिसतरह अम्ल , क्षार के प्रभाव को उदासीन कर देती हैं वैसे ही हानिकारक उर्जा को क्रिएटिव उर्जा प्रभावहीन कर देती है।



 *क्रिएटिव ऊर्जा हर व्यक्ति योग के द्वारा खुद आसानी से क्रियेट कर सकता है फिर उसे बैगा इत्यादि के जंजाल में फंसने की जरूरत नहीं है।



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अब बात करते है ब्लैक मैजिक, नजर लगना जैसे अंधविश्वासी तत्व किस व्यक्ति पर असर करता है....


......इसमे एक मजेदार तथ्य यह है कि *जो व्यक्ति अंधविश्वास को जितना ज्यादा मानता है,,, प्रायः वही लोग ब्लैक मैजिक और नजर लगने जैसी बातों से परेशान होते है।* 



अर्थात जो इन पर शिद्दत से विश्वास करता है उन पर ही ब्लैक मैजिक और नजर लगना असर करता है।




यही कारण है कि इनका असर विज्ञान पर विश्वास करने वाले *शहरी क्षेत्रों* में कम होता है ,,


जबकि साइंस को कम मानने वाले *ग्रामीण क्षेत्रों* में उसमे भी *जंगली क्षेत्रों* में इसका बोलबाला ज्यादा होता है।



उक्त समस्त बातें योग के विभिन्न सिद्धान्तों के अनुसार बताई गई है। कृपया इसे अक्षरशः मेरा विचार न समझे।


धन्यवाद।।


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सोमवार, 17 जनवरी 2022

मंजिल || manjil

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बस में सफर करने के दौरान *ड्राइवर* सोचता है कि वह लोगो को घर पहुंचा रहा ,


बस का *मालिक* भी सोचता है कि वह पहुँचा रहा है,,


बस में चढ़ा *मुसाफिर* विचार करता है कि वह खुद मंजिल की ओर जा रहा है,,,


वही आसपास के लोग सोचते है कि *बस* लोगों को घर पहुंचा रहा है,,,,







कुछ लोग यह भी कह सकते है कि यात्री द्वारा दिया *पैसा* उनको घर तक ले जा रहा है,,,,,


कुछ अन्य लोग घर तक ले जाने का श्रेय *पेट्रोल डीजल* को देते है


लेकिन क्या सचमुच ड्राइवर, मालिक, यात्री, बस, पैसे, पेट्रोल डीजल इत्यादि किसी को मंजिल तक ले जा रही है।



.... *दरअसल मंजिल तक ले जाता है मुसाफिर के मन मे उठा वह विचार जब उसने मंजिल तक पहुंचने के लिए बस में बैठने की बात ठानी।*


धन्यवाद।।


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मूर्ख कौन ? || Murkh kaun

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बात सन 1950 के आसपास की है,,


तब पूरे भारत के समान *छत्तीसगढ़* में भी अंधविश्वास का बोल बाला था,



तांत्रिक- ओझा या बैगा- गुनिया लोग भोले भाले जनता को देवी देवताओं का डर दिखा कर भेड़-बकरी, मुर्गा- मुर्गी इत्यादि का बलि देकर खूब धन ऐंठते थे।


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तब किसी घर के मुखिया *रामचरण* को भी यही डर दिखाया गया कि देवता नाराज है बलि देनी होगी।



रामचरण ने कहा 'देवता की पूजा पूरे विधि विधान से सम्मानपूर्वक होगी लेकिन किसी जीव की हत्या नही होगी।'


यानी रामचरण *सेत पूजा* के पक्ष में थे जिसमें खीर पूड़ी पकवान के चढ़ावे से पूजा अर्चना होता है।



बैगा गुनिया ने डराते हुए कहा 'बिना बलि दिये देवता शांत नहीं होंगे बल्कि बाद में तंग करेंगे।'


लेकिन रामचरण ने कहा 'आप पूजा कीजिए बाकी बाद में जो होगा मैं संभाल लूंगा।'



तब से रामचरण के घर में हमेशा सेत पूजा होने लगी ,,, *बलि पूजा* हमेशा के लिए बंद हो गया।



इसके बाद रामचरण और उसके परिवार ने कई पीढ़ी तक सुख शांति से जीवन यापन किया, उन्हें कोई समस्या नही हुई बल्कि वे और उन्नत हुए।


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अब बात करते हैं सन 2021 में सरकारी नौकरी कर रहे एक दूसरे परिवार का मुखिया *श्यामचरण* की...


बैगा गुनिया ने इसे भी देवताओं के नाम पर डराया,, बलि देने को कहा।



श्यामचरण ने तत्काल 5 बकरों की बलि दी,, भव्य आयोजन हुआ, पियक्कड़ों की फौज आमंत्रित हुई मदिरापान पर सब खूब झूमे।


ऐसा लगा जैसे पूजा तो केवल बहाना है, असल में मांस मदिरा खाना है।


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अब बताइये कौन समझदार है? गवाँर कौन है??

🤔🤔





अनपढ़ रामचरण या पढ़ा लिखा सरकारी सेवक कथित बुद्धिजीवी श्यामचरण।


लोग अक्सर पुराने जमाने के लोगो को *नासमझ-गवाँर* कहते है ,,,


लेकिन वे भूल जाते है कि उस कठिन दौर में भी रामचरण ने अंधविश्वास के विरुद्ध साहस पूर्ण कदम उठा लिया...



...वही आज आधुनिक युग में कथित  जागरूक लोग भी थोड़ा सा साहस दिखाने में न केवल घबरा रहे है बल्कि सामाजिक कुप्रथाओं के सामने नतमस्तक तक हो जाते है।


सार यह है कि -


*किसी स्थान के प्रभावशाली लोग या परिवार के मुखिया जब हिम्मत कर एक बार सामाजिक बुराईयो के विरुद्ध तन कर खड़ा हो जाते है, तो क्या मजाल की कुप्रथायें जीवित रह सके।* 


              *----------- सत्य घटना से प्रेरित*


धन्यवाद।।


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एक ही थीम पर आधारित लघुकथाएँ || Ek hi thim par aadharit Laghukathaye

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                                           1️⃣ पहला


एक ईगल कनाडा में उठी शीत लहर के साथ उड़ान भरते हुए अमेरिका आदि को पार करते हुए दक्षिण अमेरिका के अंतिम छोर में पहुंच जाता।


आगे महासागर था,, वहां पर एक दूसरा ईगल उसे आगे दरिया होने की बात बताते हुए उसे वापस मुड़ने के लिए कहता है।


लेकिन ईगल जमीन की ओर वापस नहीं उड़ पाता ,, इसका कारण वह बताता है कि -


...... चूँकि महीनों तक हवा की दिशा में उड़ने के कारण अब उसमें विपरीत दिशा में उड़ने की क्षमता नही है।* 



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एक ही थीम पर आधारित लघुकथाएँ || Ek hi thim par aadharit Laghukathaye



                                          2️⃣ दूसरा


एक एम्प्लॉई जो इनकम टैक्स विभाग में कार्यरत था, अच्छे परफॉर्मेंस के चलते बेस्ट एम्प्लॉई का पुरस्कार पाता है।


लेकिन कुछ समय बाद ऑफिस में नये बॉस के आने से स्थिति बदली और वे सभी भ्रष्ट व्यवस्था को समर्पित हो गये।



कई सालों तक यह खेल चला ,, अंततः एक बार फिर ऑफिस में परिस्थितियां बदली,  जब कोई दूसरा व्यक्ति बॉस बनकर आया और भ्रष्ट व्यवस्था समाप्त हुई।


लेकिन बेस्ट एम्प्लॉई का अवार्ड पा चुके शख्स के काम से असंतुष्ट होकर बॉस ने उसे फटकारा,,


तब उसने अपना दुखड़ा सुनाया कि-


 असल में *वह कई साल से रोज रिश्वत लेकर काम कर रहा है,,, इसलिए वह भूल चुका है कि बिना रिश्वत के कैसे काम किया जाता है??* 🤔🤔🙂


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                                         3️⃣ तीसरा


एक बार मीठे पानी यानी नदी की मछली जब समुद्र में चले जाती है, तो वहां के खारेपन से बेचैन हो जाती है।


वही पर एक दूसरी मछली जो समुद्र की होती है वह उसे नदी में वापस जाने का मार्ग दिखाती है,,


एक ही थीम पर आधारित लघुकथाएँ || Ek hi thim par aadharit Laghukathaye



तब नदी की मछली कहती है कि वह नदी में वापस नही जा पा रही है क्योंकि,,,



 *...लंबे समय तक धारा के साथ तैरने के कारण अब वह धारा के विपरीत नही तैर पा रही है* ।



कुलमिलाकर कहानी के थीम यह है कि-" किसी व्यवस्था के अनुकूल कार्य करना आसान है व्यवस्था के प्रतिकूल कार्य करना मुश्किल है।"



दूसरे शब्दों में कहे तो एक बार सुविधा भोगी बनने के बाद उस सुविधा के बिना कार्य करना कठिन है।




उम्मीद है कि एक ही थीम यह लघुकथा आपको पसंद आया होगा।



धन्यवाद।।


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बुधवार, 12 जनवरी 2022

भूसा भारी कैसे हुआ || Bhusa bhari kaise hua

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रोज भारी भरकम बोझा ढोने वाले मजदूर को एक दिन भूसे से भरी बोरी को मालिक के घर ले जाना था।


बोरा हल्का होने के कारण मजदूर तेजी से चल रहा था ,,


पीछे- पीछे बोरे का मालिक और उसका मित्र भी था ,, जो लगातार पीछे और पीछे होते जा रहे थे।


एकाएक मालिक ने मजदूर से कहा 'बोरे में केवल भूसी ही नही कई किलो सोना भी है,, सावधानी से ले चलो'


इतना सुनते ही मजदूर की गति कम होती गई,,लेकिन कुछ समय बाद में उसकी गति इतनी धीमी हो गई कि बोरी मुश्किल से घर तक पहुचाई।





मित्र ने मालिक से पूछा ' मजदूर के द्वारा बोरा लादने के बाद बोरे का वजन तो उतना ही था चाहे भूसी हो या सोना फिर मजदूर थककर धीमा क्यो हो गया'


मालिक ने कहा -' मित्र  आप मेरे साथ ही तो थे,,, तो क्यो ना आप खुद विचार करे कि मजदूर धीमा क्यो हो गया........।


🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🙏🙏🙏



 .......असल मे मजदूर के काफी तेज चलने से मालिक उसके साथ नही चल पा रहा था,, 


इसलिए उसने जानबूझकर झूठ बोला कि बोरे में सोना है ताकि मजदूर धीरे चले ,,, जिसे सुनकर पहले तो मजदूर हड़बड़ा गया और धीरे चलने लगा फिर उसके धीमे होने से मालिक भी साथ चलने लगा। 


अब मजदूर की मनो स्थिति देखते है,, मालिक ने जैसे ही कहा कि बोरे में भूसी के साथ सोना भी है, सावधानी से ले चलो ,,, तो आरम्भ में मजदूर ने मालिक की बात मानते हुए बोर के समान को कोई नुकसान न हो इसलिए धीरे चला ।


लेकिन बाद में उसके मन मे यह विचार आने लगा कि उसने सिर में लाखों रुपये की सम्पत्ति लदी हुई है जिसे वह कभी प्राप्त नही कर सकता।


मजदूर सोचने लगा कि उसे केवल चंद रुपये मजदूरी के मिलेंगे,, लेकिन यदि वह बोरे को लेकर भाग जाता है तो लाखों रुपये मिल जाएंगे ....


यानि अब उसके शरीर के साथ उसका मन भी थकने लगा जबकि बोरे में केवल भूसा है, सोना तो है ही नहीं 


लेकिन मजदूर के शरीर को भूसे और सोने दोनो का भार महसूस हो रहा था,, वही उसके मन को सोने के भौतिक भार से ज्यादा उसका मूल्यात्मक भार परेशान कर रहा था।  



इसी उधेड़बुन में फंसे होने के कारण उसकी गति बहुत धीमी हो जाती है लेकिन चोरी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता और बोरी मुश्किल से घर तक ले पहुंचाता है।


....तो इसतरह कुछ देर विचार करने के बाद मालिक के मित्र को कारण समझ मे आ जाता है।


धन्यवाद।

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कौन क्या फैलता है || kaun kya failata hai

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एक ज्वेलरी व्यापारी का शहर में बहुत प्रसिद्ध दुकान था।



क्वालिटी युक्त समान, अच्छी सर्विस और बढ़िया व्यवहार के कारण उसके सभी दुकानों में भीड़ लगी रहती थीं।



व्यापारी की कुल चार दुकाने थी जो एक ही कतार में थी। इसमे सभी दुकानों में प्रायः बराबर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी।



उसे इन चारों दुकान से लगभग एक समान मासिक आय मिलती थी।



व्यापारी अधिकतर बाहर दौरे में रहता था ,,, अतः चारो दुकानों में उसने अपने 4 विश्वासपात्र मुनीम को नियुक्त किया था, जो अपने अपने दुकान का हिसाब किताब रखता था।


इन चारों में एक मुनीम बेईमान था,, वह अन्य मुनीमो को भी बेईमानी के लिए भड़काता था,,लेकिन वे ईमान के पक्के थे इसलिए वे उनकी बातों में नही आये।



खैर...इधर हिसाब में लगातार हेराफेरी से व्यापारी को बेईमान मुनीम पर शक हुआ। 



उसने एक बार अपना दौरा बीच मे रदद् कर सभी दुकानो में धावा बोला, सभी के हिसाब दुरुस्त थे केवल बेईमान मुनीम को छोड़कर।




इस प्रसंग में व्यापारी को मुनीम पर शक इसलिए हुआ क्योंकि एक समान इनकम देने वाली 4 दुकानो में से एक में लगातार कई महीनों से कम इनकम होने लगी,, जबकि शेष में अच्छा मुनाफा हो रहा था।



यही कारण था कि बेईमान मुनीम अन्य मुनिमो को भी बरगलाया करता था,, ताकि एक साथ बेईमानी करने में सभी दुकानों का आय कम दिखे और व्यापारी को उन पर शक न हो।



इस लेख से यह निष्कर्ष निकलता है कि -


*मूर्ख -मूर्खता, आलसी-आलस्यता, धूर्त-धूर्तता और बेईमान-बेईमानी फैलाने का प्रयास करता है.....* 



....ताकि वह अलग से चिन्हित होकर पकड़ में न आये।


धन्यवाद।।


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सन 1970 का 10 हजार रुपये आज के समय में कितना होगा? || 1970 ka 10000 rupaye aaj ke samay me kitna hoga?

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हमने लोगों को अक्सर यह कहते हुए सुना है कि पुराने जमाने में फलाने व्यक्ति के पास 10 हजार या 20 हजार या उससे अधिक राशि थी जो आज के  लाखों या करोड़ो रूपये के बराबर है।



लेकिन वे मोटेतौर भी बता नहीं पाते उस समय का 10000₹ आज के समय मे कितने रुपये के बराबर है।


आइये आज हम इस प्रश्न का उत्तर जानने का प्रयास करते हैं।



देखिये भारत एक विकासशील देश है, जहाँ की मुद्रा का मूल्य हमेशा घटते जाता है,, क्योंकि हम *आयात ज्यादा और निर्यात कम* करते हैं।



जिससे यहाँ की मुद्रा का धीरे धीरे *अवमूल्यन/इनफ्लेशन* होता है अर्थात आज हम कोई वस्तु की जितनी मात्रा 100₹ में खरीद सकते है ,, आने वाले समय मे उसके लिए 100 रु से ज्यादा देने होंगे।


अर्थात भारत में महंगाई बढ़ रही है क्योंकि रुपये की मौद्रिक मूल्य कम हो रही है। महंगाई को मापने की इकाई *महंगाई दर* कहलाती है।


भारत मे *महंगाई दर प्रायः 6%* माना जाता है। वैसे कभी कभी यह कम ज्यादा हो जाता हैं लेकिन मोटेतौर पर 6% मान सकते है।





अब आते है मुख्य प्रश्न में कि 1970 का 10 हजार अभी कितना होगा?


सन 1970 से 2022 तक 52 वर्ष होगा...हर साल 10 हजार ₹, 6% की दर से बढ़ेगी...


1 वर्ष में - 10000 का 6% = 600₹

कुलराशि 10000+600=10600₹


2 वर्ष में - 10600 का 6% = 636₹

कुलराशि 10600+636= 11236₹

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यही प्रक्रिया 52 वर्ष तक करे  या फिर *चक्रवृद्धि मिश्रधन के सूत्र* का प्रयोग से गणना आसानी से कर सकते है।



तो *अंतिम राशि 206969 ₹* होगी, मोटे रूप में 2लाख 7 हजार रु.



इसतरह सन 1970 का 10000₹ आज 52 साल बाद 2.07 लाख ₹ के बराबर होगी।


 *निष्कर्ष यह है कि 10हजार₹ लगभग 2 लाख ₹ के बराबर हुआ न कि करोड़ो के* 



उम्मीद है कि गणना कैसे करनी है,, यदि आपने सीख लिया है,, तो आप के सामने कोई फेक नही पायेगा और आप यथार्थ के करीब होंगे।


उक्त पोस्ट में मुझसे कोई गलती हुई हो तो कृपया अवश्य अवगत कराए ताकि मैं भी अपनी खामियों को जान पाऊ।


धन्यवाद।।


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Nupur Sharma statement hindi | नूपुर शर्मा ने माफ़ी क्यों मांगी

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अक्सर राजनीतिक पार्टियों के कुछ नेता अपने अपने उल्टे सीधे बयान से सुर्खियों में बने होते हैं।


जैसे बीजेपी के सुब्रमण्यम स्वामी, साक्षी महाराज, मेघालय गवर्नर सत्यपाल मलिक,,, वहीं कॉंग्रेस के दिग्विजयसिंह, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर इत्यादि।

सबसे नई घटना बीजेपी नेता नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल की है। 


इस फेरहिस्त में सपा से आजम खान, एआईएमआईएम से ओवैसी, शिवसेना से संजय राउत को भी शामिल कर सकते है।



Nupur Sharma statement hindi | नूपुर शर्मा ने माफ़ी क्यों मांगी
                                                  **स्त्री है कुछ भी कर (बोल) सकती है **😀😀


इनके उल्टे सीधे बयान का एक कारण तो आदतन इनकी बोलने की शैली इस प्रकार का होना की विवाद पैदा हो जाये।


ठीक है,  बोलने के तौर तरीके से विवाद पैदा हो सकता है, लेकिन लगातार विवाद हो तो जरूर दाल में कुछ काला है।


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दरअसल इन नेताओं को इनकी पार्टी के द्वारा विभिन्न मुद्दों पर विवादास्पद बयान देने के लिए अधिकृत किया जाता है।


जिन मुद्दों पर पार्टी खुलकर अपना विचार नही रख पाती,, उन पर ये नेता खुलकर बोलते है। अर्थात एक पूर्व  निश्चित एजेंडे के तहत ये लोग बोलते है। 


 प्रायः इनके बयान विशेष वर्ग को संतुष्ट कर उनका वोट हासिल करने या उस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए होता है। 


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कभी- कभी बात बहुत ज्यादा आगे बढ़ने पर पार्टी इनके बयानों से को उनके निजी विचार बताकर पल्ला झाड़ लेती है।


लेकिन इन्हें पार्टी से कभी निकाला नही जाता, भले निकालने का दिखावा किया जा सकता है क्योंकि शीर्ष नेताओं की सहमति से ही वे यह बड़बोलापन दिखा रहे होते है।


राजनीति में इनके बयान से कई बार पार्टी को फायदा तो कई बार नुकसान भी होता है।


हाँ इन नेताओं की तुलना पार्टी के छुटभैया नेता, विधायक, सांसद ,अन्य पदाधिकारी से नहीं की जा सकती क्योंकि इन पर पार्टी का उतना नियंत्रण नहीं होता। 


कुल मिलाकर राजनीतिक दावपेंच के चलते इन बड़बोले नेताओं की दुकान चलते रहती है अन्यथा अधिकांश बड़बोले नेताओ  का जमीनी आधार न के बराबर होता।


धन्यवाद।।


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फेमिनिस्म क्या है? || Feminism kya hai?

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फेमिनिस्म के लिए हिंदी में  नारीवाद/स्त्रीवाद शब्द प्रचलित है।


फेमिनिस्म एक ऐसी विचारधारा है जो महिलाओं का पुरुषों के समान अधिकार की बात करती है। इसके समर्थक *फेमिनिस्ट* कहलाते हैं।


अर्थात यह लैंगिक समानता/ जेंडर इक्वालिटी का समर्थन करती है।


यह नई विचारधारा नही है बल्कि पूरी दुनिया में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के विरोध में काफी पहले इसकी उत्पत्ति हो चुकी है।


शिक्षा के प्रचार- प्रसार और आधुनिकता की लहर से अब जाकर यह विचारधारा काफी मजबूत हुई है।


वैसे इसका फैलाव काफी हुआ है फिर भी फैलाव की तुलना में सुधार कम हुआ है,,, खासकर तीसरी दुनिया कहे जाने वाले देशों में।




फिर इस विचारधारा के परिणाम में विचलन भी बहुत दिखाई देता है , विचलन कई आधार पर देखे जा सकते है।


जैसे स्थान के आधार पर गांव-शहर में, वैसे ही धार्मिक, जातिगत या क्षेत्रीय विचलन हो सकता है।


मतलब भिन्न- भिन्न देश ,क्षेत्र ,धर्म या जाति, आयवर्ग में सुधार की मात्रा अलग -अलग है।


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खैर आज के समय में हर समझदार व्यक्ति फेमिनिस्म का समर्थन करता है। ध्यान रखें मैंने समझदार शब्द का प्रयोग किया है।


हम सब को भी फेमिनिस्म का समर्थन करना चाहिए ,, भला कौन महिलाओं पर अत्याचार को सही ठहरा सकता है?


लेकिन कहा गया है कि *अति सर्वत्र वर्जयेत* ,,, कोई विचारधारा बहुत अधिक पनपने के नुकसान भी है।


पहली दुनिया की तो बात ही छोड़िये हमारे भारत में भी इसके साइड इफेक्ट दिखने लगे हैं।


 *थप्पड़ गर्ल लखनऊ और जोमैटो डिलवरी बॉय बैंगलोर* की घटना इसके प्रसिद्ध उदाहरण है। आप इस सम्बंध में गूगल या यूट्यूब में सर्च कर पुष्टि कर सकते हैं।


हालांकि महिलाओं पर हो रहे अत्याचार की तुलना में ये साइड इफेक्ट बहुत कम है।


लेकिन फेमिनिस्म विचारधारा का आड़  लेकर किसी निर्दोष को सताना ठीक नहीं है।



यानी समाज को सचेत रहना होगा कि इसका दुरुपयोग न हो। जैसे यात्रा के दौरान यदि भीड़ ज्यादा न हो तो 20 साल की महिला को सीट देने की जगह किसी 60 साल के बुजुर्ग पुरूष को सीट देना ज्यादा ठीक है।


सच्चा फेमिनिस्म यह नहीं है कि महिलाएं पुरुषों से बढ़कर है, बल्कि वह तो *समानता के उस सिद्धांत* को मानता है जिसके अनुसार कोई एक दूसरे से बड़ा नही है ...

....स्त्री और पुरूष दोनो बराबर है,,, दोनो समान हैं।


धन्यवाद।।


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भोलू हर रोज की तरह अपने पान ठेले पर बैठा पान बना रहा था। उसी समय एक कार आकर ठेले के पास रुका उसमें से सूट पहने एक आदमी गाड़ी के काँच को नीचे ...