शनिवार, 26 नवंबर 2022

दिनकर और मधुकर | Dinkar Aur Madhukar

 एक धनवान व्यक्ति अपने युवा पुत्र *दिनकर* को कारोबार के तौर तरीके सिखाना चाहते थे लेकिन समय का अभाव होने के कारण इसके लिए उसे अपने एक मित्र के पास भेजा।




उसका मित्र *मधुकर* भी एक कारोबारी था  साथ ही युवाओं को व्यापार की बारीकियाँ भी सीखाता था। व्यापारिक तौर तरीके सीखाने में मधुकर को महारथ हासिल था।




अगले दिन सुबह दिनकर अपने पिता के मित्र मधुकर के पास पहुँचा। नौकर उसे बैठक कक्ष में ले गया जहाँ पर मधुकर एक छोटी कुर्सी में बैठा था। दिनकर सोफे में विराजमान हुआ।




दिनकर ने अपने वहाँ आने का कारण बताया जिसे सुनकर मधुकर ने कहा " तुम *अगले हफ्ते* आना, अभी तुम सीखने के लिए तैयार नहीं हो।"




दिनकर वापस घर गया, पिता को सारी बात बताई। पिता ने कहा- 'मधुकर बहुत पारखी आदमी है, अब वहाँ जाना तो तुम कुर्सी में बैठ जाना।'




अगले हफ्ते फिर दिनकर मधुकर के घर पहुंचा, अपने पिता के कहे अनुसार सीधे कुर्सी में बैठ गया लेकिन संयोग से इस बार मधुकर पीढ़े में बैठा था। मधुकर ने इस बार उसे *अगले महीने* आने को कहा।




निराश दिनकर वापस घर लौटा। पिता को सारी बात बताई, पिता ने सिर पकड़ते हुए कहा - ' अरे बेवकूफ मधुकर तुमसे सम्मान चाहता है,, तुमसे प्रत्यक्ष सम्मान मिलने के बाद ही वह कुछ सिखायेगा। '



दिनकर और मधुकर | Dinkar Aur Madhukar



दिनकर चुपचाप उसकी बातों को सुनता रहा।



...फिर पिता ने कहा- 'अब अगले माह जाओगे तो नौकर से चटाई माँगना और जमीन पर बैठ जाना।'




अगले माह दिनकर फिर से मधुकर के घर पहुंचा और चटाई लेकर जमीन पर बैठ गया।




लेकिन इस बार भी संयोग ऐसा था कि क्या कहे?



मधुकर इस बार खड़ा हुआ था और दिनकर को बैठता हुआ देख उसने तुरंत उसे अगले साल आने की फरमान सुना दी।


दिनकर और मधुकर | Dinkar Aur Madhukar



सबक यह है कि आपके हृदय में किसी विद्या को सीखने की ललक एक बात है लेकिन सिखाने वाले के प्रति सम्मान दिल में होने के साथ-साथ प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक तौर तरीकों में भी यह बात दिखनी चाहिए।



वही रटन्त विद्या हर परिस्थिति में काम नहीं आता।


धन्यवाद


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मंगलवार, 8 नवंबर 2022

भीड़ | The Crowd

 # भीड़ # लघुकथा

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भीड़ को किसी दूसरे जनसभा में ले जाना था, इसके लिए एक नेता ने भीड़ को संबोधित किया। नेता ने ओजस्वी भाषण दिया और अंत मे लोगों की सहमति प्राप्त करने के लिए कहा - ' तो बताइये भाइयों और बहनों कौन-कौन सभा में चलना चाहेगा '  



नेताजी को उम्मीद थी कि उसके तेजतर्रार भाषण से लोग खुद ही हाथ उठाकर जाने के लिए तैयार हो जायेंगे। लेकिन दो चार कार्यकर्ताओं को छोड़कर किसी ने भी हाथ नही उठाया,, नेताजी ने थोड़ा झेंपने के बाद फिर से अपनी बात दोहराई लेकिन नतीजा जस का तस रहा।



अब पास खड़े एक दूसरे नेता ने लोगों को सम्बोधित किया उसने भी उसीतरह का भाषण दिया और अंत में कहा - ' तो बताइए भाइयों और बहनों ऐसा कौन है जो उस सभा में नही जाना चाहेगा '



पहले की तरह इस बार भी भीड़ में किसी ने भी हाथ नही उठाई अर्थात सभा मे जाने को सभी लोग सहमत थे ऐसा भाव प्रकट हुआ। 


भीड़ | The Crowd


कार्यकर्ताओं में जोश की लहर दौड़ गई वे भीड़ को पास में खड़े हुए बसों में बैठाने लगे।


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दरअसल इंसान की स्वभाविक प्रवृत्ति यह होती है कि वह भीड़ के साथ चलना चाहता है। लोग भीड़ से हटकर अपनी सहमति या असहमति प्रकट करने में संकोच करते है।



यही कारण है कि पहले नेता के भाषण के बाद लोग अपनी स्वीकृति प्रकट करने के लिए हाथ नही उठा पाये, वही दूसरे नेता के भाषण के बाद लोग अपनी अस्वीकृत देने के लिए भी हाथ नही उठा सके।


धन्यवाद 🙏🙏

सबसे ज्याद जरूरी काम || Sabse jyada jaruri kam

भोलू हर रोज की तरह अपने पान ठेले पर बैठा पान बना रहा था। उसी समय एक कार आकर ठेले के पास रुका उसमें से सूट पहने एक आदमी गाड़ी के काँच को नीचे ...