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लुटेरों से तंग आकर इस बार सेना को भेजा गया। इन लुटेरों ने ऐसे किले पर कब्ज़ा कर लिया था जो देश की महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग को नियंत्रित करता था,, अतः लूटमार अचानक ही बढ़ गई थी
सेना जब किले की ओर जा रही थी, तब उन्हें किसानों की एक टोली मिली जो भूख प्यास से बेहाल थे। उन्होंने सेना के कमांडर से मदद मांगी की उन्हें भी किले तक ले चले क्योकि वे अब पैदल चलने में असमर्थ है।
कमांडर ने उन्हें साथ लिया और कुछ घोड़ो में उसकी टोली को बैठाकर किले तक ले आया।
किले पर हमले के पहले कमांडर ने अपने जासूसों को अंदर जाकर सामरिक जानकारी लाने को कहा।
लेकिन सभी जासूस पकड़े गए क्योंकि पहरेदारो को उनकी शरीरिक कद काठी तलवार जैसे अस्त्र शस्त्र चलाने वाले हाथों की अच्छी पहचान थी।
निराश कमांडर ने अब किसानों से सहायता मांगी ,, किसान किले के अंदर गये कुछ दिनों के बाद वे लूटेरो की सेना , हथियार , स्थिति के बारे में जानकारी लेकर आये फिर कमांडर ने किले पर हमला कर उसे जीत लिया।
अब किले के अधिकार क्षेत्र में आने वाली समस्त कृषि भूमि किसानों की टोली को सौप दी गई क्योंकि लूटेरे तो केवल लूटमार करते थे कृषि नही करते,, जिससे जमीन बंजर हो गई थी।
खैर कुछ ही समय बाद पूरे क्षेत्र में कमांडर ने शांति कायम कर दी वही किसानों ने भी बंजर भूमि को हरा कर दिया।
*यह कहानी हमे सह अस्तित्व के उस सिध्दांत को बताती है जिसके अनुसार एक दूसरे की सहायता और सहयोग से अलग अलग कार्य प्रकृति वाले या जाति, धर्म, नस्ल, भाषा इत्यादि के लोग भी हँसी खुशी रह सकते है।*
जैसे हम 25 दिसंबर को हम क्रिसमस, अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिन एक साथ मना सकते है। बिना किसी पर्व का विरोध किये,, साथ ही तुलसी पूजन जैसे पर्व भी मना सकते है।
निष्कर्ष यह है कि -
*खुद के त्योहार, पर्व, धर्म को बड़ा बताने के लिए दूसरे को छोटा बताने वाले विचार का हमे त्याग करना होगा,,, यही सच्चा सहअस्तित्व को दर्शाता है ।
धन्यवाद।।
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