सोमवार, 16 मई 2022

रंग बदलते लोग | Rang Badalte Log

 बात तब की है जब मेरी पोस्टिंग इंदौर में थी। उस दिन दोपहर को ऑफिस से घर आया तो बाहर खड़ी गाड़ियों और चप्पलों से से अनुमान हो गया कि जरूर घर में मेहमान आये हैं।



अंदर पहुंचा तो पुनीत कुर्सी पर बैठा मिला, बगल में उसका भाई धनंजय भी था। आवाज़ से पता चल रहा था कि अंदर महिलाओं और बच्चों की टोली भी बैठी है।



पुनीत ने कहा-" भाई साहब हमारे यहाँ शादी है आप सभी को आना है।"



मैंने सभी की खैरियत पूछी ,पुनीत ने हाल चाल बताया तभी मेरे लिए भी चाय आ गई।


पुनीत ने आगे कहा- "सुना है इंदौर की बाज़ारो में इन दिनों बड़ी रौनक होती है। भई घर मे बड़े दिनों बाद पहली शादी है, हमने सोचा क्यों न ब्याह की खरीदारी इंदौर से ही कर ले ।"


मैंने सहमति में सिर हिलाया। धनंजय चुपचाप चाय की चुस्कियां ले रहा था।



दरअसल पुनीत और धनंजय दोनो भाई हमारे दूर के रिश्तेदार थे जो गाँव में अलग-अलग रहते थे। प्रारंभिक विवाद के बाद अब दोनों में शायद सुलह हो गया था। वे धनंजय के बेटी की शादी का निमंत्रण देने आये थे।


पुनीत ने मुझसे कहा- "भाई साहब आपको भी हमारे साथ खरीदारी के लिए बाज़ार चलना होगा।" मुझे दूसरे काम थे लेकिन मैं उन्हें मना नहीं कर पाया।


हम उबेर बाज़ार पहुंचे जहाँ शादी का सारा सामान मिल जाता था। बच्चों में बड़ा उत्साह था जिस दुकान में जाते वहाँ हमारी ही भीड़ लग जाती।


लेकिन बच्चों से ज्यादा उत्साह पुनीत और उसकी पत्नी में दिखाई दे रहा था। वही धनंजय केवल हाँ - नही सिर हिलाने तक सीमित था।


खैर शाम को वे विदा हो गये, जाने के पहले पुनीत ने मुझे फिर याद दिलाया शादी अगले हफ्ते है आपको जरूर आनी है। 



रात्रि भोजन के समय श्री मती जी ने मुझसे शादी में जाने के बारे में चर्चा की। मैंने अपनी व्यस्तता का हवाला दिया। उसने भी सहमति जताई कि बच्चों का परीक्षा भी तो है।


रंग बदलते लोग | Rang Badalte Log



पखवाड़े भर बाद बच्चों की गर्मी की  छुट्टियां चालू हो गई साथ ही मैं भी थोड़ा खाली हुआ तो गाँव जाने का प्रोग्राम बना।



गाँव तो भई गाँव ही है,, हवा बदली जलवायु बदली शहर की कीच कीच और पो-पो से दूर गाँव मे बड़ी शांति मिली।


दूसरे दिन रास्ते में पुनीत मिला चेहरा मुरझाया लग रहा था लेकिन देखते ही गले लग गया। प्रसन्न होकर कहने लगा- "शादी में तो आप नही आये लेकिन अब आपको हमारी मेहमान नवाजी तो स्वीकार करनी होगी।"


वह मुझे खींचकर अपने घर ले गया तुरंत पकौड़े बनाने को कहा। मैंने शादी के बारे में पूछा तो उसने मुझे ब्याह की सुखद यादों से रुबरु कराया। लेकिन विदाई की बात करते पुनीत और उसकी पत्नी दोनों की आँखे नम हो गई। अभी साल भर पहले ही उसकी बेटी का रोड एक्सीडेंट में निधन हुआ था, शायद उसकी याद आ गई होगी वैसे उसका एक बेटा भी था जो शहर में रहता था।



पड़ोस में धनंजय का घर था, पुनीत मुझे वहाँ मेल मुलाकात के लिए ले गया।



अभी धनंजय से मैं हाल चाल पूछ ही रहा था तभी पुनीत किसी काम से वहाँ से चला गया।


धनंजय ने बेटी के ब्याह की बड़े विस्तार से जानकारी दी। कैसे वह बड़े कष्ट के साथ ब्याह निपटाया, किस- किस में चीज में कितना- कितना खर्च हुआ? किस तरह उसने पैसे जुगाड़ किये, कितना पैसा उधार लिया।


आगे बताया कि किसी ने उसकी सहायता नही की फिर भी उसने शादी का सारा प्रबन्ध बेहद शानदार किया। उसने कहा पुनीत केवल दिखावा करता है एक रुपये तक शादी में सहयोग नहीं किया।


धनंजय की बातों का लब्बोलुआब यह था कि शादी उसने अपने दम पर निपटाई और बेहद तड़क भड़क से निपटाई।



हाँ पुनीत के बारे में उसके द्वारा कही बात सुनकर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन समझ गया कि पारिवारिक ईर्ष्या राग द्वेष भी तो कोई चीज है जिससे बड़े- बड़े ज्ञानी नहीं बच पाये फिर भोले मानवो की क्या बिसात?


अगले दिन सुबह 10 बजे वापस इंदौर जाने को तैयारी चल रही थी। तभी माँ कच्चे आम का थैला लिये पहुंची,, उसके हाथ में एक दूसरा थैला भी था।


माँ बोली- "पुनीत ने मिठाई भिजवाये है, बेचारा पुनीत अपनी बेटी की तो शादी नही कर पाया लेकिन धनंजय के बेटी की शादी में और नही तो लाख भर रुपये फूँक दिये होंगे।"


 माँ की बातें सुनकर मेरे मन में धनंजय द्वारा पुनीत के बारे में कही गई बात गूँज उठी,, खैर मैं इंदौर रवाना हुआ।


खाली रहने पर मेरे हृदय को इस तरह की कई बातें तीव्रता से कचोटती थी इसलिए मैं जल्द इंदौर जाना चाहता था क्योंकि मुझे पता था कि व्यस्तताएँ जरूर इन सब को स्मृति से हटा देगी।


धन्यवाद🙏🙏

Best hindi kahaniya : जादुई एसी | Jadui AC

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गर्मी का दिन था, कूलर बिगड़ने पर घर के वृद्ध ने मैकेनिक बुलाई।



मैकेनिक घर आने पर कूलर को देखने लगा।



बुजुर्ग गर्मी को लेकर बड़बड़ा रहा था,, 'बड़ी गर्मी है भाई!  इस बार बड़ी गर्मी हैं।'



मैकेनिक मुस्कुराया और कहा - 'गर्मी लग रही है चाचा! तो पेड़ भी लगाया करो ।'



बुजुर्ग तनिक रूखे स्वर में बोले- 'हाँ जैसे पेड़ लगाना मेरे अकेले का ठेका है।'



अब तक मैकेनिक ने कूलर का मुआयना कर लिया था, बताया कि मोर्टर और पँखा दोनों खराब है। दुकान ले जाना होगा। 



मैकेनिक ने अपना तामझाम समेटा और वृद्ध के साथ दुकान की ओर प्रस्थान किया।


Best hindi kahaniya : जादुई एसी | Jadui AC


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रास्ते मे मैकेनिक ने कहा- 'कूलर बार - बार बिगड़ रहा जितने पैसे आप उसे बनवाने में खर्च कर चुके हो, उसमे थोड़ा और मिला देते तो एसी आ जाता।'



बुजुर्ग - तो फिर क्या एसी खरीद लू?


मैकेनिक - हाँ।



कुछ सोचते बुजुर्ग ने पूछा- 'बेटा ये एसी, कूलर से ज्यादा ठंडा कैसे करता है?'



बुजुर्ग की उत्सुकता देखकर मैकेनिक उसे समझने लगा- 'देखो चाचा कूलर पानी से हवा में नमी मिलाकर उसे ठंडा करता है। नमी एक लिमिट तक ही ठंडा रहता है,, अतः हवा भी उतना ही ठंडा होता है।'



उसने आगे बताया- 'एसी में इस तरह की कोई लिमिट नही है, वह हवा से गर्मी को मन चाहे स्तर तक चूस लेती है फिर गर्मी को बाहर और ठंडी हवा को अंदर  छोड़ देती हैं। क्यों है न बिल्कुल जादू की तरह?

बुजुर्ग मुस्कुराया।


💦🫧💦🫧💦🫧💦



मैकेनिक ने पूछा- 'वैसे चाचा आप मुम्बई के लगते नही हो कही बाहर गाँव से आये हो क्या है आप की कहानी ?'



वृद्ध ने बुझे मन से कहा- 'हाँ बेटा! हम नर्मदा घाटी के रहवासी है। दो सन्तानों में अभी मैं बेटी के घर मुम्बई में रह रहा हूँ...


...पुत्र को नर्मदा मईया के आँचल रूपी जंगल बचाने की सनक रहती थी। रात-दिन आंदोलन, धरने, सभा, प्रदर्शन में उलझे मेरे बेटे को पता नही किसने गोली मार दी। लोग कहते है लकड़ी माफिया या रेत माफिया में से किसी का काम होगा।'



रुंधी आवाज में बूढ़ा बोला- 'पुलिस भी हत्यारों को नही पकड़ पाई।


आगे वह कहता है-" मेरा बेटा हमेशा कहता था कि कुछ थोड़े से लोग अपने फायदे के लिए सारे संसाधनों पर साँप की तरह कुंडली मारे बैठा है। वही जहर रूपी कूड़ा जनता के लिए छोड़ रहा है"फिर मैकेनिक की ओर देखकर बुजुर्ग कहता है- 'ठीक तेरे 'जादुई एसी' की तरह।



मैकेनिक को बुजुर्ग की आखिरी पंक्ति शायद समझ में नही आई। लेकिन उसे दुखी देखकर उसकी पूछने की हिम्मत नहीं हुई। वह असमंजस सा चेहरा लिये दुकान पहुंचा।



मैकेनिक - 'तो चाचा आपके लिए एक एसी निकाल दूँ?'



वृद्ध ने आँखों मे चमक लिए हुए कहा- 'नही बेटा! एक नया कूलर दे दो,, जो मेरे बेटे की तरह सबको ठंडक दे,,,बिना किसी को हानि पहुँचाये।'



मैकेनिक ने अनमने ढंग से सहमति में  सिर हिलाई।



धन्यवाद



🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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चलने वाले पेड़ | Chalne vale Ped

 किसी जमाने में जब पेड़ भी एक जगह से दूसरी जगह चलते थे। 


तब एक पहाड़ के नीचे तराइयों में चारो ओर कुछ नही था,, पेड़-पौधों की बात तो दूर घास तक नही उगी थी उस निर्जन स्थान में। बस चारो ओर पत्थर, रेत और बीहड़ थे। हाँ कुछ पेड़ पहाड़ के ऊपर जरूर थे।



वही एक पुराना पेड़ भी न जाने कब से तराइयों के नीचे ठहरा था।



एक दिन वहाँ एक युवा पेड़ चलता हुआ आया और पुराने पेड़ से पूछा- 'दादा जी! मुझे पहाड़ के ऊपर जाना है रास्ता नही मालूम, कृपया आप बता देंगे क्या?'



उसकी विनती सुन पुराने पेड़ ने कहा- 'हाँ क्यों नहीं, लेकिन तुम पहाड़ पर क्यों जाना चाहते हो।'


युवा - 'असल मे मैं सबसे बड़ा और सबसे ऊँचा पेड़ बनना चाहता हूँ। पहाड़ में रहने से मेरी यह इच्छा पूरी हो सकती है।'



बूढ़े पेड़ के होठों पर मुस्कान दौड़ पड़ी जैसे किसी बच्चे ने बचकानी बात कह दी हो।



बूढ़े पेड़ ने कहा - 'देखों बेटा! यह पथरीली, रेतीली और कठिनायों से भरा सूखी जगह। जल का कही कोई स्रोत नहीं है। यहाँ भूमिगत पानी भी बहुत गहराई में मिलता है, इसीकारण यहाँ पेड़ो का टिकना मुश्किल है।'



आगे बूढ़े पेड़ ने पूछा- 'वैसे तुम कहाँ से आये हो और यहाँ कैसे पहुंचे?'



युवा पेड़- 'हम दूर देश से आये है वहाँ बहुत हरियाली है। यहाँ आने के लिए दो मार्ग थे, हम लोग हरियाली वाले मार्ग से आये क्योंकि दूसरा रास्ता तो बिल्कुल मरुस्थल था।'


इसकी बाते सुनकर बूढ़ा पेड़ बोला- 'बेटा! तुम लौट जाओ, यहाँ की कठिन स्थिति में कोई पेड़ यहाँ नही टिक पाता, बरसात आने में अभी चार महीने बचे हैं।'


आगे उसने कहा- 'पहाड़ के ऊपर रहना तो और भी मुश्किल है, तुम्हे पानी कहां से मिलेगा? देखों सैकड़ों वर्षों मे चंद पेड़ ही पहाड़ पर टिक सके हैं। बेटा तुम लौट जाओ।'

चलने वाले पेड़ | Chalne vale Ped



युवा पेड़ ने पूछा- 'लेकिन बाबा यहाँ रहने का कोई तो उपाय होगा न।'


बूढ़ा पेड़- हाँ एक उपाय तो है लेकिन..।



उसी समय युवा पेड़ के साथी वहाँ पहुँच गये जिसने उसके साथ सफर की शुरुआत की थी।


बूढ़े की बात अधूरी रह गई थी,, इस बीच युवा पेड़ को उसके साथियों ने कहा- 'चलो अच्छा हुआ हम सब मिल गये,, आओ पहाड़ के ऊपर चलते हैं।'


युवा- 'मैं अभी इस बाबा से ऊपर जाने का रास्ता पूछ रहा था।'


साथीगण - 'उसकी जरूरत नहीं है, आओ हम ,रास्ता ढूंढ लेंगे।'


उसने बूढ़े से विदा लिया और साथियों के साथ चला गया।



बूढ़ा कातर नेत्रो से उसे जाता हुआ देख एक गहरी साँस छोड़ी।


युवा पेड़ अपने साथियों के साथ पहाड़ पर रहने लगा लेकिन जल की कमी से वे सभी कुछ भी हफ्ते में मारे गये।


चलने वाले पेड़ | Chalne vale Ped


कई वर्ष बीत गये। एक दिन पहाड़ पर चढ़ने के लिए एक और युवा पेड़ आता है, आस पास की जानकारी के लिए वह उसी बूढ़े पेड़ से पूछताछ करता है।



बूढ़ा पेड़- 'पहले यह बताओ तुम कहाँ रहते हो, किस रास्ते से आये हो?'



युवा- 'मैं दूर देश का रहने वाला हूँ, कई महीनों पहले निकला था, मैं मरुस्थल वाले रास्ते से होकर आया हूँ।'



उसका उत्तर सुनकर बूढ़ा प्रसन्नचित्त होकर कहता है - आओ बेटा तुम्हारा स्वागत है,, वह रहा ऊपर पहाड़ जाने के रास्ते। तुम निश्चिंत होकर पहाड़ में रह सकते हो।



वह युवा पेड़ पहाड़ के ऊपर जाकर रहने लगता है। वह इस दुष्कर जगह में आसानी से कई सालों तक टिक जाता है।



वह उन चंद पेड़ो में शामिल हो जाता है जो आसमान की ऊँचाइयों में अपना अस्तित्व तलासते है।


धन्यवाद।।

मंगलवार, 10 मई 2022

चरण स्पर्श कितना उचित - अनुचित || Charan sparsh kitna uchit - anuchit

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प्रायः  बड़ो का हम चरण स्पर्श करते है,  चरण स्पर्श करने का कारण बड़ो से आशीर्वाद प्राप्त करना,, उन्हें सम्मान देना है।



चूंकि जो बड़े है वे अधिक उम्र, अधिक अनुभव के कारण उन्हें हमारी अपेक्षा दुनिया की ज्यादा समझ होती है,,, समस्या से कैसे निपटें? उसकी समझ भी प्रायः उनमे ज्यादा होती है।



 उनसे मार्गदर्शन लेने, सहयोग लेने, मुशीबत में हमे सहायता दे,, इस हेतु एक तरह से संरक्षक के रूप में बड़ो का उपयोगिता महत्वपूर्ण होती है।



अतः उन्हें आदर पूर्वक सम्मान देने के लिए अभिवादन सूचक तरीको का प्रयोग किया जाता है जैसे नमस्ते, प्रणाम, दण्डवत प्रणाम,राम राम इत्यादि।



प्रणाम या चरण स्पर्श में यदि बड़ी आयु के लोग हमारे रिश्तेदार या माता पिता जैसे पारिवारिक लोग हैं तब उनका चरण स्पर्श केवल सम्मान देने के लिए नही अपितु आत्मीयता के कारण भी किया जाता है।


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अब बात करते है छत्तीसगढ़ की जहां कुछ को छोड़कर अधिकांश जातियों में लोग *भांजे -भांजियों का चरण स्पर्श* किया जाता है।



भांजे-भांजी का चरण स्पर्श मामा-मामी करे कितना तर्कहीन है देखिये।



मामा शब्द में दो बार मा आया है यानी मामा को माँ से बढ़कर माना गया है, हालांकि माँ बढ़कर कोई नही होता,,, फिर भी *मामा- मामी को मां बाप के समकक्ष* माना जा सकता है।



अब बताइये कितने शर्म की बात है कि माँ बाप के समकक्ष माने जाने वाले मामा मामी से भांजे भांजी को चरण स्पर्श कराया जाना।



लगभग सभी भांजे मामा से आयु में छोटा होता है,अनुभव में छोटा, दुनिया की समझ कम तब मामा द्वारा भांजे को कौन सा सम्मान देना है जिसके कारण वह भांजे का चरण स्पर्श कर रहा है।



आत्मीयता का सम्बंध तो भांजे द्वारा मामा के चरण स्पर्श से भी हो सकता है।



कुछ लोग यह कहते हैं कि *भगवान राम का ननिहाल* छत्तीसगढ़ था,,कौशिल्या चंदखुरी(आरंग) की बेटी थी राम छग के लोगो का भांजा हुआ, इसलिए छग. के लोग सम्मान स्वरूप भांजे को प्रणाम करते हैं।



यह तर्क अभी का है यानी 4 - 5 साल पुराना,, यह किसी कट्टर रीति रिवाज समर्थक के द्वारा सोशल मीडिया में फैलाया गया तर्क है जिसमे कोई दम नही है...



...क्योंकि भांजे का चरण स्पर्श छग में  काफी प्राचीन रिवाज लगता है जिसे *छत्तीसगढ़ के इतिहास के किसी भी पुस्तक या प्रमाण में भगवान राम से नही जोड़ा गया है।* 



अर्थात लोग मनगढ़ंत ढंग से इस रिवाज को भगवान राम से जोड़ रहे है।ताकि इस गलत रिवाज को धार्मिक भावनाओं का बल मिले। 



जबकि प्राचीन प्रमाणों में इस रिवाज का सम्बंध भगवान राम से हैं ही नही।



 *ध्यान रहे मैंने भगवान राम, कौशिल्या, या छत्तीसगढ़ को उसका ननिहाल बताने वाले किसी भी तथ्य को मनगढ़ंत नही कहा है।* 


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खैर अब चर्चा के दूसरे पहलू में आते है जहाँ पर कई जातियों में चाची एवं भाभी अपने भतीजे एवं देवर को प्रणाम करते हैं।



चाची आयु,अनुभव अन्य सभी बिंदुओं पर माँ के बराबर है वह बेटे रूपी भतीजे को प्रणाम करें यह कितना उचित है, आप खुद सोचिए।



वैसे ही भाभी को *भाभी माँ* भी कहा जाता है। परिवार में माता पिता के बाद बड़े भैया-भाभी को *दूसरा अभिभावक* माना जाता है,, तब भाभी द्वारा देवर का चरण स्पर्श कहाँ तक उचित है।



कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मामा-मामी द्वारा भांजे भांजी, चाची द्वारा भतीजे और भाभी द्वारा देवर का पैर स्पर्श करना नितांत ही अनुचित रिवाज है।



वैसे चाची द्वारा भतीजे और भाभी द्वारा देवर को प्रणाम करने का रिवाज तेजी से कम हो रहा है।



लेकिन भांजे-भांजी का चरण स्पर्श करने का प्रचलन लगभग ज्यो का त्यों है।



हमारी जाति में भी यह चलन है,, हालांकि मैंने व्यक्तिगत रूप से भांजे भांजी को प्रणाम करना बंद कर दिया है।



लेकिन *मजेदार बात यह है कि आज तक इस मुद्दे पर मुझसे एक भी व्यक्ति प्रेरित नही हुआ है।* 🙂🙂



बाकी पोस्ट जिसमे अलग अलग मुद्दे मैंने उठाये हैं उसमें कम या बहुत कम लोग प्रेरित हुए ,,, फिर भी कुछ तो प्रेरित हुए हैं 



लेकिन भांजा भांजी चरण स्पर्श मुद्दे पर मैं पूरी तरह असफल रहा हूं यानी मेरी सफलता शून्य रही है,, 



*उम्मीद है कि इस शून्य के पीछे काफी सारे शून्य लिख जाएंगे, फिर सामने में एक दो भी लिख जाये।* 


धन्यवाद


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

शनिवार, 7 मई 2022

दो टोकरी

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बात ब्रिटिश काल की है।


किसी इलाके में उस समय खूब अकाल पड़ते थे,,


लेकिन मालगुजारो के घर मे कोई कमी नही थी क्योंकि कुओं और नहर के पानी पर उसका अधिकार था।



 *केउ* अपनी पत्नी *मेउ* के साथ एक मालगुजार के घर मे गेहूँ मिजाई के लिए गया था ,,


काम क्या वह तो बेगारी थी, मजदूरी में उसे एक पैसा तक मिलने वाला नही था।



खैर काम खत्म कर केउ *मालगुजार* के पास पहुंचा और गेहूँ की सफाई के बाद निकले भूसे- कंकड़ को ले जाने की अनुमति मांगी।


काफी मिन्नतों के बाद मालगुजार ने एहसान दिखाते हुए केवल दो टोकरी भूसा ले जाने की इजाजत दी।



असल मे भूसे कंकड़ के ढेर में गेहूँ के कुछ टूटे दाने या खोखले घुन लगे दाने निकल आते थे,, अतः केउ -मेउ खुश थे कि आखिर कुछ तो मिला।


प्रेरणादायक कहानी | Motivational story in hindi | दो टोकरी


अगले दिन तहसील में सभी मालगुजारों को सालाना हिसाब करना था,,, मालगुजार ने इसके लिए अपने छोटे भाई( *छोटे साहब* ) को भेजा,, शाम को तहसीली से हिसाब किताब करके लौटते समय उसके ऊपर डकैतों ने हमला कर दिया।



कमीशन में मिले रुपयों की दो बक्सों में एक को डकैत ले गये। दूसरे को छोटे साहब लेकर भागे लेकिन डकैतों ने गोली चला दी,,,


लहुलुहान होने पर भी छोटे साहब किसी तरह भाग निकले।



आधी रात हो चुके थे, छोटे साहब अभी गाँव के पास पहुँचा ही था कि पास के घर मे सहायता मांगते समय वह बेहोश हो गये।



संयोग से यह घर केउ - मेउ का था , उसने उसे तुरंत घर के अंदर ले आये, रुपये का बक्सा घर मे रखा और गाँव के कोतवाल को बुला लाया उसने मालगुजार के घर सूचना भेजी।



तुरंत छोटे साहब को इलाज के लिए शहर ले जाया गया, उसका प्राण बच गया, साथ रुपयों का बक्सा केउ ने मालगुजार को सौप दिया ।



अब तक आप सोच रहे होंगे कि यह तो *एक टिपिकल अच्छे गरीब और अत्याचारी अमीर की कहानी है*


 जिसमे धनवान, गरीब का शोषण करता है, लेकिन गरीब उसका भला करता है और फिर धनी को सबक मिल जाता है ,, जिसके बाद बेचारे निर्धन व्यक्ति का दुःख दर्द खत्म हो जाता है...



... *तो कहानी बिल्कुल ऐसी नही है,,, तो आगे पढिये क्या होता है??* 


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अगले दिन पुलिस ने घटना की जाँच की केउ के घर भी आया थोड़ी पूछताछ के बाद चला गया।



उसके साथ आये मालगुजार से डरते हुए केउ ने छोटे साहब की जान बचाने की खुशी में कुछ इनाम देने की बात की।



तब मालगुजार ने उसे *हड़काते* हुए कहा शुक्र करो की तुम्हे पुलिस पकड़कर नही ले गया, कही तुम भी डकैतों से मिले हुए तो नही हो, तभी तुम्हारे घर से मेरे भाई घायल होकर मिला।


यह सुनकर केउ घबरा गया और डर के मारे हाथ पाव जोड़ने लगा।



आगे मालगुजार ने कहा चलो थोड़ी देर के लिए मान भी लेते है कि तुम डाकुओं से नही मिले हो तब भी तुम्हारे घर के सामने कोई घायल हो जाये तो सहायता करना तो तुम्हारा फर्ज है।


.... तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारे जैसे लोगो को हमारी सेवा करने का अवसर मिला।



यह कहकर अंत में मालगुजार अपने घर जाने के लिए तांगे में सवार हुआ ,,फिर न जाने क्या सोचा , केउ को आवाज देकर पास बुलाया और उससे कहा-


 *" ठीक है कल घर आ जाना और इनाम के तौर पर दो टोकरी भूसा ले जाना।"* 




तो प्रिय पाठकगण *जिस तरह हर कहानी का हैप्पीएण्ड नही होता ,, वैसे ही किसी का भलाई करने में हमेशा आपको सम्मान मिलेगा जरूरी नहीं है।* 



कभी -कभी भलाई करने में भी सामने वाले से आपको बुराई या अपमान भी मिलेगा।


धन्यवाद।।


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

दुश्मन का दुश्मन, दोस्त ? | Dushman ka Dushman Dost ?

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एक जंगल में शेर रहता था। हर किसी से उसकी लड़ाई होते रहती थी।



 पहले भालू , फिर हाथी, मगरमच्छ और आज तेंदुए से लड़ाई हुई।



भालू, हाथी, मगरमच्छ और तेंदुआ सभी एक जगह इकट्ठा हुए और उनमें सहमति बनी की वे एकसाथ मिलकर लड़ेंगे और शेर को हरायेंगे,,



फिर क्या था इस बार सभी मिलकर लड़े लेकिन आश्चर्य कि शेर ने उन्हें फिर भी हरा दिया।



कुछ दिनों के बाद लकड़बग्घे की एक झुँड का टकराव एक हिरण का शिकार करते वक्त शेर से हो गया।



शेर दहाड़ लगाते हुए लकड़बघ्घों से भीड़ गये,,काफी देर की छीना झपटी के बाद शिकार लकड़बघ्घों को हासिल हुआ,, और शेर पीछे हट गया।



एक तरह से यहाँ पर शेर की हार हुई और लकड़बघ्घों की जीत।



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क्या कारण है कि-



जिस शेर को जंगल के बड़े- बड़े महारथियों की आपसी एकता नही हरा पाई...



....उन्हें लकड़बघ्घों की मामूली झुँड ने परास्त कर दिया??



दुश्मन का दुश्मन, दोस्त ? | Dushman ka Dushman Dost ?



देखिए यह सच है कि एकता होने से बड़े से भी बड़ा काम आसानी से किये जा सकता हैं।



लेकिन एकता *बेमेल* नही होनी चाहिए,,  हाथी, भालू, मगरमच्छ और तेंदुए की एकता खानपान, रहन सहन और प्रवृत्ति की दृष्टि से भिन्न थी। 



अतः वे शेर को हराने के लिए एक दूसरों के गुण दोषों को भाँपकर कोई व्यवस्थित योजना नही बना पाये।



साथ ही *सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे सभी केवल इसलिए एक हुए थे कि शेर उसका दुश्मन हैं और उसे हराना है।* 



अर्थात इनकी *एकता का उद्देश्य नकारात्मक* था जिसमे कोई सकारात्मक वस्तु की प्राप्ति नही होनी थी, बल्कि वे सभी शेर को हराकर अपने अहम को संतुष्ट करना चाहते थे।


जैसे वर्तमान सन्दर्भ में देखे तो पाकिस्तान और चीन दोनो की दोस्ती का आधार भारत से दुश्मनी है।



वही पर लकड़बग्घे सभी दृष्टि से समान थे,, एक दूसरे के गुणों से भलीभाँति वाकिफ थे अतः लड़ाई में सामूहिक शक्ति का सही प्रयोग करना वे अच्छे से जानते थे।



साथ ही उनकी एकता का उद्देश्य शेर को हराना या अपने को बड़ा साबित करना नही था, बल्कि शिकार को प्राप्त करना था।



यानी इनकी एकता सकारात्मक थी।



प्रसंग का सारांश यह है कि बेमेल एकता से पहले अपने लोगों में एकता हो ,,



साथ ही एकता का आधार *दुश्मन का दुश्मन दोस्त सिद्धांत* न होकर कुछ सकारात्मक पहलू को समेटे हुए हो तो और बढ़िया।



धन्यवाद।।


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शुक्रवार, 6 मई 2022

निडरता || fearlessness

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एक बार हैवेन में नये एंजेल की भर्ती चल रही थी। प्रक्रिया अंतिम चरण में थी, केवल एक सीट बाकी थी लेकिन लोग अब भी बड़ी संख्या में कतार में लगे थे।



चयनकर्ताओं ने सभी कैंडिडेट से कहा कि जाओ धरती से कोई ऐसा इंसान ढूंढ लाओ जो बिल्कुल निर्भीक हो, जो किसी से न डरता हो।



सभी लोग प्रश्न सुनते ही धरती की ओर दौड़ पड़े। वही कुछ लोगों ने अपने को एंजेल बनने की होड़ से बाहर कर लिया और एक किनारे हो गये। शायद उन्होंने  हार मान ली थी।



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खैर सभी कैंडिडेट अपने-अपने हिसाब से निर्भीक लोग लाने लगे।



किसी ने अनेक युद्ध जीत चुके योद्धा, किसी ने तपस्वी, किसी ने दबंग राष्ट्राध्यक्षों को ले आये ।



किसी ने सबकुछ खो चुके भिखारी,, यहाँ तक कि कुछ ने गुंडे-डॉन सरीखे लोगो तक को उठा लाये।


निडरता || fearlessness


लेकिन अलग अलग तर्को से चयनकर्ताओं ने सब को खारिज कर दिया और रिपोर्ट मुख्य चयनकर्ता को दिया,, उसने सबसे पहले उन उम्मीद्वारों को बुलाया जिन्होंने निर्भीक लोगों को खोजने के सवाल पर अपनी उम्मीद्वारी छोड़ दी थी।



मुख्य चयनकर्ता के पूछने पर एक को छोड़कर सभी ने बताया कि पूरी तरह निडर व्यक्ति दुनिया में नही होता, हर किसी को थोड़ा न थोड़ा डर होता ही है। शतप्रतिशत निडर व्यक्ति का दुनिया में होना असम्भव है।



अब उस एक कैंडिडेट को बुलाकर मुख्य चयनकर्ता ने पूछा कि तुमने उम्मीद्वारी क्यो छोड़ी?



उसने बताया कि 'पहले मैं भी एंजेल बनने के लिए लालायित था,,लेकिन मुझे डर भी था कि यदि एंजेल न बन पाया तो क्या होगा?'



आगे उसने बताया कि 'यहाँ की आपाधापी देखकर मुझे एहसास हुआ कि इस डर के साथ एंजेल बनना ठीक नही इसलिए मैं लाइन से हट गया।'



जवाब सुनकर मुख्य चयनकर्ता ने उस कैंडिडेट को एंजेल की आखरी सीट दी *क्योंकि उसे पता चल गया कि धरती में चाहे कोई निडर व्यक्ति हो न हो लेकिन यह कैंडिडेट खुद अपने आप मे निडर है।*



जब हैवन में पद प्राप्ति के लिए अपने गुणों को बढ़ चढ़कर दिखाने की मारा मारी चल रही थी..



*तब एक कैंडिडेट द्वारा आसानी से अपनी कमियों को स्वीकार कर लेना बड़ी बात है।*


लेकिन कहानी का असली क्लाइमैक्स तो अभी बाकी था क्योंकि उस कैंडिडेट ने एंजेल का पद अस्वीकार करते हुए मुख्यचयनकर्ता से धरती में वापस जाने की अनुमति मांगी।


उसने कहा कि - 'वह अपनी कमियों के साथ वह एंजेल का पवित्र पद धारण नही कर सकता, इसलिए वह जाना चाहता है।'



मुख्यचयनकर्ता जान गया कि इसमें पद की लालसा नही है लेकिन उसे जो सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह था निडरता से अपनी बात रखने की क्षमता। फिर उसने उसे धरती में जाने की अनुमति दे दी।


धन्यवाद


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बुधवार, 4 मई 2022

टॉमी और डेविड || Tomy and Devid

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दो कुत्ते टॉमी और डेविड कचरे के ढेर में हड्डी खोज रहे थे।



तभी उन्हें एक रोटी मिली,, आपस में लड़ने के बजाय उन्होंने तय किया कि कोई एक कुत्ता उस रोटी को रख लेगा और बदले में दूसरे के लिए हड्डी खोजेगा।



टॉमी ने रोटी खाई अतः शर्त मुताबिक उसे डेविड के लिए हड्डी खोजनी थी।



दो दिनों तक टॉमी को कुछ नहीं मिला,  भूख से उसका बुरा हाल था। एक दिन उसे हड्डी और भोजन मिल गई,, भूख से व्याकुल टॉमी ने उसे खा ली।



इधर यह बात डेविड को पता चली कि हड्डी मिलने पर भी टॉमी ने उसे हड्डी नही दी और शर्त का पालन नही किया।



अब डेविड शिकायत के लिए कुत्तो की मंडली जाने का फैसला किया।



तभी रास्ते मे उसके पास हाँफते हुए एक कुत्ता आता है..... और उसे बताता है कि टॉमी को हड्डियों का ढेर मिला है और उसने खाने के लिए डेविड को बुलाया है।



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तातपर्य यह है कि *जब अस्तित्व की लड़ाई हो तब ध्यान केवल अस्तित्व की रक्षा करने में जाता है।*



वही शर्त पालन, दूसरों की सहायता, दान दक्षिणा इत्यादि,, प्रायः _*अतिरिक्त धन या साधन*_ उपलब्ध होने पर किया जाता हैं।



यही कारण है कि प्रस्तुत कहानी में टॉमी दो दिनों तक भूखा रहने के बाद मिलने वाले भोजन को खुद खा लिया क्योंकि उन्हें अपनी प्राण बचानी थी।



इसके बाद हड्डियों का ढेर मिलने पर, उसके पास अतिरिक्त साधन की अवस्था में वह अपना शर्त पालन करता है।



हरिश्चंद्र जैसे कुछ लोग अपवाद स्वरूप होते है जो स्वयं अत्यंत भूख की अवस्था में होने पर भी भूखे भिखारी को भोजन दे देता है।



 *मोराल यह है कि यदि हरिश्चंद्र जैसा नही बना जा सकता तो क्या हुआ?टॉमी जितना नैतिक स्तर तो आसानी से पाया जा सकता है।*



धन्यवाद।।


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गुलाब और धतूरा || Gulab aur Dhatura

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फूलों के एक बग़ीचे में चारों ओर गुलाब ही गुलाब था। गुलाब के कारण बगीचा स्वर्ग के समान लग रहा था।



तभी मधुमक्खियों का झुँड गुलाब का रस लेने के लिए लपका। गुलाब ने कहा - 'हम मधुमक्खियों को कुछ नहीं देंगे' ,, और उन्हें झिड़ककर भगा दिया।




बगीचे से बाहर निकलते मधुमक्खियों की नजर एक किनारे में उगे धतूरे पर पड़ी,, वे उसके पास पहुंचे।



तभी धतूरे ने कहा - ' मैं अपने फूलों का रस देने को तैयार हूँ लेकिन उससे बने शहद पीकर कही कोई *पागल* न हो जाये'।



मधुमक्खियों ने धतूरे की बात समझी और खतरा भाँप कर वहाँ से चले गये।


गुलाब और धतूरा || Gulab aur Dhatura


कुछ समय बाद उस बगीचे में एक आयुर्वेदाचार्य पहुँचे,, उसे गुलाब के कुछ फूल लेने थे। गुलाबों ने अपने स्वभाव के अनुरूप उसे मना कर दिया।



निराश होकर बाहर जाते आयुर्वेदाचार्य की नजर भी धतूरे पर पड़ी। धतूरा सबकुछ देने को तैयार था लेकिन साथ ही अपने जहरीले गुण से भी उसे अवगत कराया।



आयुर्वेदाचार्य ने धतूरे के औषधीय गुणों को पहचानते हुए उससे दवाइयां तैयार की जिससे लोगो के कई असाध्य रोग ठीक हो गये।



अब धीरे -धीरे धतूरे की प्रसिद्धि बढ़ने लगी,, लोग उसे पवित्र मानने लगे। कुछ लोग धतूरे से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उसके फूल को *शिवजी के चरणों में अर्पित* कर दिये।


गुलाब और धतूरा || Gulab aur Dhatura


तातपर्य यह है कि *गुलाब के समान केवल गुण होना ही पर्याप्त नहीं है उस गुण का समाज की भलाई के लिए उपयोग होना भी जरूरी है।*



धतूरे के समान यदि आप को लगता है कि आप के पास कोई गुण नही है या केवल अवगुण है तब भी निराश न हो क्योंकि...


           ... पता नही कब आयुर्वेदाचार्य रूपी मार्गदर्शन से आप में ऐसे निखार आ जाये कि किसी बड़े और पवित्र कार्य मे अग्रणी भूमिका निभाते नजर आए।



धन्यवाद।।


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सबसे ज्याद जरूरी काम || Sabse jyada jaruri kam

भोलू हर रोज की तरह अपने पान ठेले पर बैठा पान बना रहा था। उसी समय एक कार आकर ठेले के पास रुका उसमें से सूट पहने एक आदमी गाड़ी के काँच को नीचे ...