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अक्सर राजनीतिक पार्टियों के कुछ नेता अपने अपने उल्टे सीधे बयान से सुर्खियों में बने होते हैं।
जैसे बीजेपी के सुब्रमण्यम स्वामी, साक्षी महाराज, मेघालय गवर्नर सत्यपाल मलिक,,, वहीं कॉंग्रेस के दिग्विजयसिंह, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर इत्यादि।
सबसे नई घटना बीजेपी नेता नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल की है।
इस फेरहिस्त में सपा से आजम खान, एआईएमआईएम से ओवैसी, शिवसेना से संजय राउत को भी शामिल कर सकते है।
इनके उल्टे सीधे बयान का एक कारण तो आदतन इनकी बोलने की शैली इस प्रकार का होना की विवाद पैदा हो जाये।
ठीक है, बोलने के तौर तरीके से विवाद पैदा हो सकता है, लेकिन लगातार विवाद हो तो जरूर दाल में कुछ काला है।
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दरअसल इन नेताओं को इनकी पार्टी के द्वारा विभिन्न मुद्दों पर विवादास्पद बयान देने के लिए अधिकृत किया जाता है।
जिन मुद्दों पर पार्टी खुलकर अपना विचार नही रख पाती,, उन पर ये नेता खुलकर बोलते है। अर्थात एक पूर्व निश्चित एजेंडे के तहत ये लोग बोलते है।
प्रायः इनके बयान विशेष वर्ग को संतुष्ट कर उनका वोट हासिल करने या उस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए होता है।
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कभी- कभी बात बहुत ज्यादा आगे बढ़ने पर पार्टी इनके बयानों से को उनके निजी विचार बताकर पल्ला झाड़ लेती है।
लेकिन इन्हें पार्टी से कभी निकाला नही जाता, भले निकालने का दिखावा किया जा सकता है क्योंकि शीर्ष नेताओं की सहमति से ही वे यह बड़बोलापन दिखा रहे होते है।
राजनीति में इनके बयान से कई बार पार्टी को फायदा तो कई बार नुकसान भी होता है।
हाँ इन नेताओं की तुलना पार्टी के छुटभैया नेता, विधायक, सांसद ,अन्य पदाधिकारी से नहीं की जा सकती क्योंकि इन पर पार्टी का उतना नियंत्रण नहीं होता।
कुल मिलाकर राजनीतिक दावपेंच के चलते इन बड़बोले नेताओं की दुकान चलते रहती है अन्यथा अधिकांश बड़बोले नेताओ का जमीनी आधार न के बराबर होता।
धन्यवाद।।
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