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शरीर का केवल *30% टॉक्सिन* पसीना,मैल, पेशाब इत्यादि से बाहर निकलता है,,
इसे बाहर करने लिए हम नित्य कर्म, स्नान, व्यायाम आदि करते है।
ये तो बात हुई *शारिरिक टॉक्सिन* की लेकिन *असली तो मानसिक टॉक्सिन होता है* ,,
जो कुल *टॉक्सिन का 70%* है इसे दूर करने के लिए मेडिटेशन किया जाता है।
शरीरिक टॉक्सिन की अपेक्षा मानसिक टॉक्सिन बहुत ज्यादा हानिकारक है, इसके दुष्प्रभाव से चिड़चिड़ा, गुस्सा, ईर्ष्या, तनाव, लालच, घमंड और कई बीमारियां हो जाती है।
यदि कोई यह दावा करता है कि उसे *व्यायाम* की इसलिए आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह अपने कार्य के द्वारा नियमित रूप से *शारिरिक श्रम* करता है तो उसका टॉक्सिन बाहर हो जाता है।
तो उसकी बात को सही मानी जा सकती है,,,
लेकिन यदि कोई यह दावा करे कि उसे *मेडिटेशन* की भी आवश्यकता नहीं है तो वह गलत कह रहा है,
..क्योंकि *करोड़ों में कोई एकाध ही ऐसा होता है जो अपनी जिंदगी में दुःख, घृणा, ईर्ष्या, लालच, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, घमंड इत्यादि से पूर्णतः बचते हुए कोई भी तनाव नही लेता और अपनी जिंदगी बहुत अच्छे से जी लेता है।*
अर्थात हर आम आदमी में उक्त दुर्गुण होता ही है,, केवल उसकी मात्रा कम- ज्यादा हो सकती है।
अतः प्रत्येक आदमी को मेडिटेशन की आवश्यकता है।
यदि किसी को मेडिटेशन से इसलिए आपत्ति है कि वह *हिंदूइस्म के योग* से सम्बंधित है ....
...तो मैं बताना चाहता हूं कि *मेडिटेशन का उल्लेख जैन , बौद्ध, मुस्लिम (सूफी), सिक्ख, ईसाइयत में भी है। उसमें मेडिटेशन का नाम, प्रकार, तरीके या ढंग में अंतर हो सकता है।
हाँ इतना जरूर है कि हिंदूइस्म के योग के कारण मेडिटेशन विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हुआ।
वही हिंदू धर्म के अंतर्गत आने वाले अलग- अलग जाति सम्प्रदाय में भी मेडिटेशन की अलग अलग विधियाँ बताई गई है।
*मेडिटेशन में भगवान की आराधना करना जरूरी नहीं है बल्कि इसमें मन की एकाग्रता और मजबूती का महत्व है।*
यही कारण है कि मेडिटेशन न केवल आस्तिक बल्कि नास्तिक धर्मों जैसे बौद्ध इत्यादि में भी बेहद प्रसिद्ध रहा है।
कुलमिलाकर यदि आपको वास्तव में टॉक्सिन की बड़ी मात्रा को दूर कर खुश रहना है, तो बेधड़क मेडिटेशन कीजिए।
*निःसंकोच होकर जाति धर्म की परवाह किए बगैर मेडिटेशन करे ,,*
*,,,देखना आप निश्चित ही खुश और प्रसन्न रहेंगे।*
धन्यवाद।।
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