बात तब की है जब मेरी पोस्टिंग इंदौर में थी। उस दिन दोपहर को ऑफिस से घर आया तो बाहर खड़ी गाड़ियों और चप्पलों से से अनुमान हो गया कि जरूर घर में मेहमान आये हैं।
अंदर पहुंचा तो पुनीत कुर्सी पर बैठा मिला, बगल में उसका भाई धनंजय भी था। आवाज़ से पता चल रहा था कि अंदर महिलाओं और बच्चों की टोली भी बैठी है।
पुनीत ने कहा-" भाई साहब हमारे यहाँ शादी है आप सभी को आना है।"
मैंने सभी की खैरियत पूछी ,पुनीत ने हाल चाल बताया तभी मेरे लिए भी चाय आ गई।
पुनीत ने आगे कहा- "सुना है इंदौर की बाज़ारो में इन दिनों बड़ी रौनक होती है। भई घर मे बड़े दिनों बाद पहली शादी है, हमने सोचा क्यों न ब्याह की खरीदारी इंदौर से ही कर ले ।"
मैंने सहमति में सिर हिलाया। धनंजय चुपचाप चाय की चुस्कियां ले रहा था।
दरअसल पुनीत और धनंजय दोनो भाई हमारे दूर के रिश्तेदार थे जो गाँव में अलग-अलग रहते थे। प्रारंभिक विवाद के बाद अब दोनों में शायद सुलह हो गया था। वे धनंजय के बेटी की शादी का निमंत्रण देने आये थे।
पुनीत ने मुझसे कहा- "भाई साहब आपको भी हमारे साथ खरीदारी के लिए बाज़ार चलना होगा।" मुझे दूसरे काम थे लेकिन मैं उन्हें मना नहीं कर पाया।
हम उबेर बाज़ार पहुंचे जहाँ शादी का सारा सामान मिल जाता था। बच्चों में बड़ा उत्साह था जिस दुकान में जाते वहाँ हमारी ही भीड़ लग जाती।
लेकिन बच्चों से ज्यादा उत्साह पुनीत और उसकी पत्नी में दिखाई दे रहा था। वही धनंजय केवल हाँ - नही सिर हिलाने तक सीमित था।
खैर शाम को वे विदा हो गये, जाने के पहले पुनीत ने मुझे फिर याद दिलाया शादी अगले हफ्ते है आपको जरूर आनी है।
रात्रि भोजन के समय श्री मती जी ने मुझसे शादी में जाने के बारे में चर्चा की। मैंने अपनी व्यस्तता का हवाला दिया। उसने भी सहमति जताई कि बच्चों का परीक्षा भी तो है।
पखवाड़े भर बाद बच्चों की गर्मी की छुट्टियां चालू हो गई साथ ही मैं भी थोड़ा खाली हुआ तो गाँव जाने का प्रोग्राम बना।
गाँव तो भई गाँव ही है,, हवा बदली जलवायु बदली शहर की कीच कीच और पो-पो से दूर गाँव मे बड़ी शांति मिली।
दूसरे दिन रास्ते में पुनीत मिला चेहरा मुरझाया लग रहा था लेकिन देखते ही गले लग गया। प्रसन्न होकर कहने लगा- "शादी में तो आप नही आये लेकिन अब आपको हमारी मेहमान नवाजी तो स्वीकार करनी होगी।"
वह मुझे खींचकर अपने घर ले गया तुरंत पकौड़े बनाने को कहा। मैंने शादी के बारे में पूछा तो उसने मुझे ब्याह की सुखद यादों से रुबरु कराया। लेकिन विदाई की बात करते पुनीत और उसकी पत्नी दोनों की आँखे नम हो गई। अभी साल भर पहले ही उसकी बेटी का रोड एक्सीडेंट में निधन हुआ था, शायद उसकी याद आ गई होगी वैसे उसका एक बेटा भी था जो शहर में रहता था।
पड़ोस में धनंजय का घर था, पुनीत मुझे वहाँ मेल मुलाकात के लिए ले गया।
अभी धनंजय से मैं हाल चाल पूछ ही रहा था तभी पुनीत किसी काम से वहाँ से चला गया।
धनंजय ने बेटी के ब्याह की बड़े विस्तार से जानकारी दी। कैसे वह बड़े कष्ट के साथ ब्याह निपटाया, किस- किस में चीज में कितना- कितना खर्च हुआ? किस तरह उसने पैसे जुगाड़ किये, कितना पैसा उधार लिया।
आगे बताया कि किसी ने उसकी सहायता नही की फिर भी उसने शादी का सारा प्रबन्ध बेहद शानदार किया। उसने कहा पुनीत केवल दिखावा करता है एक रुपये तक शादी में सहयोग नहीं किया।
धनंजय की बातों का लब्बोलुआब यह था कि शादी उसने अपने दम पर निपटाई और बेहद तड़क भड़क से निपटाई।
हाँ पुनीत के बारे में उसके द्वारा कही बात सुनकर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन समझ गया कि पारिवारिक ईर्ष्या राग द्वेष भी तो कोई चीज है जिससे बड़े- बड़े ज्ञानी नहीं बच पाये फिर भोले मानवो की क्या बिसात?
अगले दिन सुबह 10 बजे वापस इंदौर जाने को तैयारी चल रही थी। तभी माँ कच्चे आम का थैला लिये पहुंची,, उसके हाथ में एक दूसरा थैला भी था।
माँ बोली- "पुनीत ने मिठाई भिजवाये है, बेचारा पुनीत अपनी बेटी की तो शादी नही कर पाया लेकिन धनंजय के बेटी की शादी में और नही तो लाख भर रुपये फूँक दिये होंगे।"
माँ की बातें सुनकर मेरे मन में धनंजय द्वारा पुनीत के बारे में कही गई बात गूँज उठी,, खैर मैं इंदौर रवाना हुआ।
खाली रहने पर मेरे हृदय को इस तरह की कई बातें तीव्रता से कचोटती थी इसलिए मैं जल्द इंदौर जाना चाहता था क्योंकि मुझे पता था कि व्यस्तताएँ जरूर इन सब को स्मृति से हटा देगी।
धन्यवाद🙏🙏

कहानी सत्य घटना से प्रेरित है। धन्यवाद🙏🙏
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