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आखिरकार मैंने बहुचर्चित मूवी केजीएफ-1 देखी,
KGF= कोलार गोल्ड फील्ड,,
यह सन 2018 में रिलीज़, निर्देशक *प्रशांत नील* की मूलतः कन्नड़ भाषी फ़िल्म है जो अपनी तरह का एक अनोखा फ़िल्म है।
इस पूरे फ़िल्म को *नरेटर* (कथावाचक/सूत्रधार ) के बैकग्राउंड आवाज अर्थात वॉइस ओवर के माध्यम से दिखाया गया है।
फ़िल्म की कहानी साधारण है,, मुख्यतः *गुंडा ओरिएंटेड* फ़िल्म है, जिसमें निगेटिव शेड का अभिनेता अंत मे मसीहा जैसा बन जाता है।
लेकिन फ़िल्म का *स्क्रिप्ट और डायरेक्शन* यानी दिखाने का तरीका इतना शानदार है कि एक बार फ़िल्म देखना आरम्भ करने के बाद शायद ही कोई फ़िल्म को बीच में छोड़ना चाहेगा।
फ़िल्म *कर्नाटक कोलार में स्थिति भारत के सबसे बड़े स्वर्ण खदान* को केंद्र में रखकर वहाँ मजदूरों पर किये गये अत्याचार और माइंस माफियाओं के उठापटक पर आधारित है।
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जहां तक अभिनय की बात करे तो अभिनेता *यश* का दमदार एक्टिंग और बेहतरीन लुक ने कुछ ही समय उसे *बाहुबली के प्रभास* के समकक्ष ला खड़ा किया है।
लेकिन मैं यश की तुलना *थ्री हंड्रेड* के *जेरार्ड बटलर* से करना चाहूंगा, क्योंकि इस एकमात्र फ़िल्म ने यश को एक चॉकलेटी हीरो से सीधे गम्भीर अभिनेताओं के उच्च स्तर पर ले आया है।
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मूवी में कोई कमी है तो वह यह है कि कहानी कब सन 1951,1962, 1978, 1982, 2018 में जा रहा है, पता ही नहीं चलता। यानी अलग अलग *टाइम लाइन* में कौन सी घटना कब हुई, इस हेतु फ़िल्म को काफी ध्यान से देखने की जरूरत है।
वही इसमे काफी सारे विलेन भी है जिसके कैरेक्टर का नाम याद रखे बिना फ़िल्म आपको समझ में नही आएगी।
ओवरऑल फ़िल्म अच्छी है और *नये प्रयोग के लिए फ़िल्म मेकर्स प्रशंसा के पात्र है।*
धन्यवाद।।
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