शनिवार, 20 नवंबर 2021

समर्पण | Samarpan in hindi

बात तब की है जब देश के अधिकतर भागो में स्वास्थ्य और परिवहन सुविधाओं का अभाव था।धनीराम के पिता दयाराम अचानक बीमार पड़ गए और उसकी स्थित गंभीर हो गई तत्काल हॉस्पिटल ले जाना जरूरी था। 



उस समय चिखली जो रायपुर जिले का सबसे दूरस्थ गाँवो में से एक है , हॉस्पिटल हेतु पहले  महासमुंद फिर बलौदा बाजार और अंत में रायपुर की ओर देखता था। चूँकि दूरी और सुविधा की दृष्टि से महासमुंद ठीक लगा इसलिए धनीराम ने पिता को वहाँ ले जाने का फैसला किया गया। 






समर्पण | Samarpan in hindi




संयोग देखिए उसीसमय 3 किलोमीटर दूर स्थित सिरपुर और चिखली के बीच स्थित महानदी में बाढ़ आया था। यही से महासमुंद जाना था। अतः पिता को चारपाई में लेटाकर बैलगाड़ी से महानदी के किनारे तक तो ले आये लेकिन बाढ़ ने रास्ता रोक दिया। यह देखकर साथ में आये कुछ लोगो ने बलौदा बाजार ले जाने की बात की। 



अब दूसरा संयोग देखिये बलौदा बाजार जाने के लिए चिखली के पश्चिम तट पर स्थित पतालू नाला भी उफान पर था , जिसे पार किये बिना वहाँ जाना असम्भव था। 


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रायपुर ले जाने के बारे में विचार किया गया लेकिन आरंग तक बैलगाड़ी से ले जाना पड़ता जिससे होने समय की बर्बादी मरीज के लिए नुकसानकारी था ,, इसी उधेड़बुन में समय बीता जा रहा था 



शाम का समय और धीरे धीरे बढ़ रहे अँधेरे से साथ में आये लोग भी निराश होने लगे ,, कुछ ने घर ले जाकर गंगा जल पिलाने तक की बात कही। 



लेकिन धनीराम ने हार नहीं मानी थी उसने धीरे धीरे कम होती महानदी की और देखा ,,
उसने सोचा की खाट को यदि स्टेचर के समान ऊपर उठाया जाए तो 6 से 8 लोग नदी में पैदल लेकर चले तो उस पार जाया जा सकता है। 



खतरा यह था की कहि पर यदि जलस्तर सिर के ऊपर हो जाये तो क्या होगा ?? लेकिन पिता की जान बचाने के लिए धनीराम यह खतरा मोल लेने के लिए तैयार था। साथ में आये लोगो में कुछ ने विरोध किया लेकिन अंत में महानदी पार करने पर सहमति बन गई। 


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तब तक रात के 8 बज गए थे। 



पिता को चारपाई में उठाकर जब धनीराम अपने भाइयो और साथियो के साथ महानदी में उतरा तो एकाएक ठंडे जल से शरीर सिहर उठा लेकिन पिता को बचाने के जज्बे ने शायद शरीर को पुनः गर्म कर। 



जैसे जैसे वे आगे बढे कई जगह लगा की अब तो चारपाई बही। 



अंत में आठ सौ मीटर चौड़ी महानदी की प्रबल जलधारा भी इंसानी साहस  के आगे समर्पण कर गई । सिरपुर में वाहन किराया कर महासमुंद हॉस्पिटल में दयाराम को भर्ती कराया गया। 



बाद में  दयाराम जब ठीक हुए तो उसने प्राण बचाने वाले पुत्र धनीराम को रोते हुए गले से लगा लिया। पिता द्वारा गले लगाने शायद धनीराम को पिता का अनमोल उपहार लगा तभी उसके भी आँसू आ गए। 



समर्पण | Samarpan in hindi




शिक्षक के रूप में शिक्षा जगत में धनीरामजी  का जो योगदान है, वह तो महत्वपूर्ण है ही लेकिन मानवीय प्रेम और हिम्मत  की  जो मिशाल उन्होंने इस कहानी  में दी है वह शैक्षिक उपदेश का व्यवहारिक रूप है,,,



....मै भी अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ कि  मै धनीरामजी जैसे स्थानीय हीरो की कहानी लिख रहा हूँ। पिता के प्रति पुत्र का यह समर्पण निश्चित ही वंदनीय है। 


धन्यवाद। .


😇😇😇😇😇😇😇😇😇
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बुधवार, 17 नवंबर 2021

अनकंडीशनल लव | Unconditional iove

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एक अलग दृष्टिकोण से देखने वाले लोग पूरे मानव जीवन को स्वार्थ पर आधारित बता देते हैं,


वह कैसे ?  🤔🤔🤔🤔


जैसे आप सुबह उठकर ब्रश करते है, नहाते है, ताकि आप स्वस्थ्य रहे या बदबू न आये या आपको अच्छा लगे इसलिए यह काम करते हैं .... अर्थात यह काम आपने एक स्वार्थ के कारण किया ।


यदि ब्रश, नहाने इत्यादि न करने से आपको कोई हानि नही होती तो  स्वार्थ के अभाव में ये काम करना आप बन्द कर देते।


अब हम इसी तथ्य को भावनात्मक या इमोशनल स्तर पर लाते हैं,,,


...जहां इंसान खुशी, गम, गुस्सा, प्रेम , लगाव, नफ़रत इत्यादि भावनाओं से भरा होता है ,,, इनमें से प्रत्येक भावना के पीछे कोई न कोई कारण होता। 


यानी आपको खुशी , सुख दुख , गुस्सा, प्रेम जो भी महसूस होता है उसके पीछे कोई ना कोई कारण होता है।


कुछ लोग इसी कारण को स्वार्थ कहते हैं 


जैसे आप यदि किसी को नष्ट करना चाहते हैं तो आपके मन में उसके लिए नफरत की भावना आ सकती है 


इसका ठीक उल्टा यदि आप किसी आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं तो आपके मन मे उसके प्रति प्रेम या सहानुभूति हो सकता है 


दोनों उदाहरण में स्वार्थ यह है कि पहला नष्ट हो और दूसरा आगे बढ़े।


यानी प्रेम करने के पीछे भी स्वार्थ है या कंडीशन हो सकता है,


...बिना स्वार्थ के प्रेम भी नही हो रहा है।





वही कुछ दूसरे लोग मानते हैं कि माँ ही एक मात्र ऐसी होती है जो बच्चे को बिना कंडीशन या स्वार्थ के प्रेम करती है।


देखिए कहने, सुनने, बोलने, लिखने में माँ की प्रेम अनकंडीशनल मालूम होती है ,, 


माँ की प्रेम अनकंडीशनल होती ऐसा कहना सभी को अच्छा भी लगता है।


लेकिन क्या वास्तव में माँ की प्रेम अनकंडीशनल लव है?


नहीं ,,, माँ की प्रेम अनकंडीशनल नही है,, 


बल्कि माँ अपने बच्चों को इसलिए प्रेम करती है क्योंकि वो बच्चा उसका अपना बच्चा है।


यानी माँ की प्रेम का कारण बच्चा उसका होना है , यही यही कारण है कि वह दूसरों के बच्चों से उस तरह या उस स्तर का प्रेम नही करती जैसे वह अपने बच्चो से करती है।


माँ दूसरों के बच्चों से हमदर्दी रख सकती हैं,, थोड़ा बहुत लगाव रख सकती है लेकिन अपने बच्चों सा प्रेम नही कर सकती। स्पष्ट है की माँ भी अनकंडीशनल लव नहीं कर पाती।   अपवाद १ 


तब अनकंडीशनल लव क्या है ???


असल मे अनकंडीशनल लव वह प्रेम है  जिसमें इंसान धरती के प्रत्येक प्राणी से बिना किसी कारण या स्वार्थ के प्रेम करता  है।


संक्षेप में बिना कारण ही सभी से प्यार करना अनकंडीशनल लव है।


अनकंडीशनल लव बहुत दुर्लभ है,, पूरे संसार में गिने चुने महापुरुष ही अनकंडीशनल लव कर पाने की स्थिति में पहुंच पाये होंगे। 


साथ ही उक्त में अपवाद १ में दर्शित अत्यल्प माँ भी इस श्रेणी में आ सकती है जो सभी को अनकंडीशनल लव करे। 


लगता है कि वसुधैव कुटुम्बकम पर आधारित अनकंडीशनल लव शायद मोक्ष / निर्वाण/कैवल्य के ठीक पहले की स्थिति है।


लेख पसंद न आये तो आप मुझे गाली भी दे सकते हैं कोई दिक्कत नहीं है।


धन्यवाद।।

*छहिन्दी और छहिंग्लिश* | Chhahindi aur Chhahinglish

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आजकल जिस तरह हम हिन्दी में इंग्लिश को  मिलाकर बोलते हैं उसे * हिंगलिश * (Hinglish) कहते हैं


वैसे ही जब हम छत्तीसगढ़ी में हिंदी मिक्स कर बोलते हैं तो उसे *छहिन्दी* कहते हैं।


इसीतरह जब छत्तीसगढ़ी, हिन्दी और इंग्लिश को मिलाकर एक साथ उपयोग किया जाता है तो *छहिंग्लिश* भाषा उत्पन्न होता है।


अभी तक छहिन्दी और छहिंग्लिश को उसके नाम यानी छहिन्दी और छहिंग्लिश से नही जाना जाता है क्योंकि इस सम्बंध में सम्भवतः छत्तीसगढ़ी साहित्य, हिंदी साहित्य, मीडिया या प्रिंट मिडिया में कोई उल्लेख नही है।


वैसे इसका उपयोग कुछ छत्तीसगढ़ी फिल्मों, यूट्यूब वीडियो इत्यादि में हँसी मजाक के प्रसंग को दिखाने में हुआ  है। 


वही छत्तीसगढ़िया लोग आम दिनचर्या में छहिन्दी और छहिंग्लिश का भरपूर उपयोग करते है।


कुछ लोग हिंगलिश, छहिन्दी, छहिंग्लिश का विरोध इस बात को लेकर करते हैं कि इससे क्रमशः हिंदी और छत्तीसगढ़ी का स्वरूप बिगड़ कर धीरे धीरे समाप्त हो सकता  है।


देखिए आज के आधुनिक समय मे किसी भी भाषा या बोली को 100% शुद्ध रखना असम्भव है,,, इसके मूल स्वरूप की रक्षा के लिए सरकार इसे मान्यता देते हुए भाषाओं की अनुसूची में जगह दे सकती है,, इसे पढ़ाई का माध्यम भी बनाया जा सकता है।


 लेकिन,,, किसी भी भाषा के आत्मा की रक्षा उस पर साहित्य लेखन, आडियो, वीडियो, चलचित्रों में बड़ी मात्रा में प्रयोग से होती है।


चाहे भाषा के स्वरूप में थोड़ा बदलाव क्यो न आ जाये हमें छहिन्दी और छहिंग्लिश के द्वारा की जाने वाली नवाचार का समर्थन करने चाहिए क्योंकि इससे भाषा की समृद्धि बढ़ती है।


उम्मीद है कि समय के साथ हिंगलिश की तरह इस पर भी लेखन बड़े स्तर पर आरंभ होगा।


 *ध्यान रखें भाषा को हमने बनाया है, न कि भाषा ने हमे। 


अतः भाषा में शोध कर नवाचार व परिवर्तन करने का अधिकार भी हमें है।


धन्यवाद।।


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सत्य घटना || satya ghatna

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बात थोड़ी पुरानी है, *सन 2007* का समय था। शाम ढलने के कगार पर था, चिड़िया अपने घोंसले की ओर लौट रहे थे।


इसी समय दो मित्र *केउ और मेउ* मोटर साइकिल में धमतरी से रायपुर आ रहे थे। अभी रेडियंट पब्लिक स्कूल जो रायपुर अभनपुर के बीच है ,, को पार किये थे।


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तब दोनों मित्र देखते है कि सड़क के बीच में भीड़ लगी हुई है, 


 किसी गाड़ी वाले ने बाइक सवार को ठोक दिया था और भाग निकला था,, दो लोग घायल होकर सड़क में कराह रहे थे।


एक की स्थिति थोड़ी ठीक थी जबकि दूसरा गम्भीर था उसे जल्द ईलाज की आवश्यकता थी।


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लोग देखते सहानुभूति प्रकट करते फिर चले जाते, किसी ने न पुलिस को फोन किया , न एम्बुलेंस को।


वैसे भी उस समय छत्तीसगढ़ में *संजीवनी 108* जैसे तुरंत मेडिकल सेवा वाहन नही चलता था साथ ही लोग पुलिस के पचड़ों में पड़ना नहीं चाहते थे।


केउ ने इनकी सहायता करने की ठानी लेकिन मेउ ने मना किया। केउ के जोर देने पर मेउ भी उसके साथ आया ।


सबसे पहले दोंनो ने घायलों को सड़क के बीच से उठाकर किनारे में नीचे की ओर ले आये ताकि कोई ट्रक- बस उन्हें अंधेरे में कुचल न दे। 


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फिर केउ ने *100 नम्बर डायल* कर पुलिस को घटना की डिटेल सूचना दी। कुछ देर बाद पुलिस और एम्बुलेंस पहुंच गए।


इसके बाद दो प्राण बचाने की खुशी में मदमस्त हुए केउ , मेउ को लेकर रायपुर चला गया।





 *यकीन मानिए पुलिस ने इसके बाद कभी भी केउ को तंग नही किया।* 


घटना सत्य है केवल पात्र के नाम काल्पनिक है।


धन्यवाद🙏🙏🙏🙏🙏

रविवार, 14 नवंबर 2021

जवान क्यो कर रहे हैं अपने ही साथियो पर हमला ? || Javan kyo kar rhe hai apne hi sathiyo par hamla?

छत्तीसगढ़ बस्तर -सुकमा आज की स्थिति में भी धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र है।


यहाँ तैनात CRPF में सन 2018 के बाद पिछले 3 वर्षों में अपने ही साथियो पर गोली चलाने की 13 घटनाएं हुईं हैं जिसमें 18 जवान मारे गए हैं। 


कई आत्महत्या की घटनाए भी हुई हैं जिसमे मृतकों की संख्या इसमे शामिल नही है।


पहले जहाँ हम सेना की शरीरिक फिटनेस की बात करते थे , वही अब मानसिक और भावनात्मक फिटनेस भी उतनी ही जरूरी है।






प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों जवान अपनों पर ही गोलिया चला देते है?

🤔🤔🤔🤔🤔🤔


 कारण -


🟢   तैनात क्षेत्र में युद्ध , नक्सल , दंगे या अन्य कारणों से अत्यधिक तनाव की स्थिति होती है जिसका दुष्प्रभाव जवानो की मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। 


🟢   अधिकारियो या सीनियर के द्वारा दुर्व्यवहार 


🟢    भोजन आवास की समस्याऍ 


🟢    छुट्टी न मिलना  


🟢.    साथियो से आपसी नोकझोंक


🟢     कई बार आर्थिक या पारिवारिक जीवन से उत्पन्न अवसाद


🟢      उचित वेतन भत्ते की कमी


🟢       मेंटोर की कमी



                  
            नवभारत: 11.11.21                               


निवारण के उपाय -


1. सरकार और विभाग इस तरह की घटना को टालने के लिए कई उपाय करती तो है लेकिन भ्र्ष्टाचार और लागू करने की कमजोर इच्छा शक्ति इसे सफल नही होने देती।


2. भ्रष्ट अधिकारियों पर भी लगाम लगाना जरूरी जो योजनाओ की सफलता में बाधा है।


3. जवानों की मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहे इस हेतु एक पूर्णकालिक मेंटोर की नियुक्ति की जानी चाहिए।


4. जवान मानसिक रूप से ठीक रहे इस हेतु मेंटोर के साथ एक जवाबदेही हेतु एक अधिकारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।


5. चूंकि जवान नक्सल और आतंकी क्षेत्रों में बहुत तनाव में रहते हैं अतः व्यवस्था ऐसी बननी चाहिए जिसमें मेंटोर खुद होकर उनके तनाव को पता करे और दूर करे।


 6. यथासंभव जवानों को आर्थिक परेशानी न हो अतः वेतनमान और भत्ते ठीक हो। ताकि जवान आर्थिक कारणों से तनाव में न आये।






7. जवानों की एक शिकायत कई बार भोजन और रहने की व्यवस्था को लेकर होता है अतः इसमे सुधार हो भ्रष्टाचार न हो।


8. कई बार जवानो की आपसी छींटाकसी बढ़कर मामला हत्या तक पहुंच जाता है अतः खुशनुमा माहौल द्वारा निवारण करने और नजर रखने की आवश्यकता है


9. पर्याप्त छुट्टियां जवानों को मिलनी चाहिये।


10. उच्चाधिकारियों और कार्यालयीन कर्मचारियों के द्वारा जवानों से अच्छा व्यवहार होना चाहिए क्योंकि कई बार खराब व्यवहार भी हमले का कारण बना है।


                कुलमिलाकर जवानों द्वारा अपने ही साथियो पर हमले की घटना का बढ़ना चिंतनीय है। इसकी उचित जाँच कर कारणों का सही तरीके से निदान किये जाने की भी आवश्यकता है

............. क्योंकि इस तरह की घटनाएं सेना या CRPF की छवि भी खराब करती है।

               जवान यदि अंदरूनी समस्याओं से जूझते रहेंगे तो नक्सल या आतंक के विरुद्ध संघर्ष भी प्रभावित होगी।


धन्यवाद।।

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शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

जिम्मेदार कौन? || Jimmedar kaun ?

बच्चा सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर रोज तैयार होने लगा और अपनी माँ से नास्ता माँगता


तब माँ कहती तू जल्दी मत नहाया कर, इस समय नास्ता नहीं बने रहता है।



बच्चा रोज पूजा पाठ करता, पिता ने चिढ़ाया हमारा बेटा पुजारी बनेगा।


शाम को 8 बजे बच्चा खाने के बाद जल्द सोने की जिद करता है,, लेकिन माँ को टी वी देखनी है, बच्चे को सुलाते तक उसका सीरियल खत्म हो जाएगा,,, इसलिए कहती तू इतनी जल्दी मत सोया कर।


बेटा बड़ा हुआ दिन भर मटरगश्ती करता बुरी संगत में फंसा रहता , रात 2 बजे तक जागता , सुबह 9 बजे उठता।


जिम्मेदार कौन??



दरअसल हर बच्चे में खुद से होकर कुछ अच्छी आदतें होती है,, समय के साथ वह पनपती भी है ...


...लेकिन जब पैरेंट्स ही उनकी अच्छी आदतों पर टोका टाकी कर दे तब परिणाम ऐसा ही आता है।


           अतः बच्चों की अच्छी आदतों को प्रोत्साहित करें ,, खासकर मजाक न उड़ाये अन्यथा बच्चे आसानी से अच्छी आदतों से दूर हो जाते हैं।


धन्यवाद।।


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बुधवार, 10 नवंबर 2021

आमिर खान और किरण राव का तलाक : धार्मिक - पारिवारिक पहलू | Aamir khan aur kiran rao ki talak

 आमिर खान और किरण राव के तलाक के साथ बॉलीवुड में एक बार फिर विवाह और तलाक के मुद्दे सुर्खियों में है।


वैसे विवाह और तलाक पारिवारिक विषय है जो सामाजिक क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जिस पर  लोग अपने अपने तऱीके से इस बारे में अपना विचार रख रहे है।



आज लोग इस तलाक को नैतिकता, नारीवाद, पारिवारिक मूल्य से जोड़कर बात कर रहे है लेकिन ,,,


सबसे ज्यादा चर्चा धार्मिक पहलू को लेकर हो रही है , खासकर सोशल मिडिया में तो इसकी बाढ़ आ गई है। 


आइये पहले विचारधारा के अनुरूप नाराजगी या विरोध या समर्थन कैसे व्यक्त किया जा रहा है पहले उसे देखते है -


1 नैतिकतावादी -

                        इनका कहना है की तलाक बच्चो के लिए विशेष रूप से हानिकारक है। 



2. नारीवादी या फेमिनिस्ट -

                       इनके अनुसार पुरुष प्रधान समाज में नारी प्रताड़ित है क्योकि पुरुषवादी सोच उन्हें एक स्त्री से संतुष्ट होने नहीं देता जिसके कारण पुरुष कई विवाह करता है। और तलाक लेता है। वही पर महिला उपेक्षित रहती है। 

 


3. पारिवारिक मूल्य -

                       इनकी अगुआई प्रायः माँ बाप बड़े बुजुर्ग करते है उनके अनुसार तलाक से परिवार की बदनामी , मनमर्जी , बड़ो की बात न मानने की बढ़ती प्रवृत्ति आदि 



4. धार्मिकतावादी -

                          ये लोग इस तलाक को लव जिहाद, धार्मिक षड्यंत्र मानते हुए विरोध कर रहे। ये हर मामले को धार्मिक दृष्टि से देखते है। वास्तव में इन्हे तलाक से दुष्प्रभावित महिलाओ या बच्चो की फ़िक्र नहीं है। 



5. व्यक्तिवादी या स्वछंदतावादी -

                            इनका विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने मामलो में व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं अपनी मनमर्जी व अपने  तरीके से जीवन जीने का अधिकार है। किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं। ये लोग केवल खुद को पहले देखते है। प्रायः ये स्वतंत्रता कि सीमा को नहीं पहचानते। 



निष्कर्ष -

              सही मायनो में देखा जाय तो तलाक किसी व्यक्ति का निजी मसला है, अक्सर हजारो तलाक रोज होते है लेकिन जब बात सेलेब्रिटी के तलाक की हो तो लोग मजे लेने लगते है। वही आमिर और किरण के मामले  हो रहा है,,आग में घी का काम धार्मिक एंगल कर रहा है। 


               खैर तलाक कोई अच्छी चीज तो है नहीं जिसकी प्रसंशा की जाय , तलाक लेने वाले दोनों कपल्स के साथ बच्चो की न केवल मानसिक अवस्था पर बुरा प्रभाव डालता,,,बल्कि बच्चो का भविष्य भी असुरक्षित हो जाता है।


               साथ ही कपल्स पर आश्रित बूढ़े माँ बाप के लिए भी तलाक कष्टकारक होता है क्योकि उन्हें बुढ़ापे में अपने बच्चो से उनकी देखभाल करने की अपेक्षा रहता है लेकिन तलाक लेने वाले अस्थिर चित्त कपल्स शायद ही अपने माता  पिता और बच्चो की अपेक्षाएं पूरी कर पाते होंगे। 


धन्यवाद।।

क्या सचमुच राकेश झुनझुनवाला की भविष्यवाणी के अनुसार 2030 तक निफ्टी एक लाख तक जाएगा ? ॥ kya sachmuch Rakesh jhunjhunwala k bhavishvani ke anusar nifty 1 lakh tak jayegi ?

अगर राकेश झुनझुनवाला की भविष्यवाणी के अनुसार 2030 तक निफ्टी 90,000-100,000 को छू लेता है, 

तो क्या होगा ?

स्टॉक की कीमते तब क्या होगी ?

आइये इन्ही सब बातों पर चर्चा करते है 


भारतीय शेयर बाजार के बिग बुल RJ यानि राकेश झुनझुनवाला ने एक इंटरव्यू में उक्त अनुमान लगाया है।


उनके अनुमान के पीछे जरूर उनका अनुभव एवं रिसर्च होगा। उनकी भविष्यवाणी सही है या गलत हमे इसके पीछे हम नही जायेंगे क्योकि...


.....भविष्य का केवल अनुमान लगाया जा सकता है और सत्यता तभी प्रमाणित होती है जब अनुमान सही जाये।



वही यदि निफ़्टी 90 हजार से 1 लाख, सन 2030 तक चला जाये तो स्टॉक के कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?


तो उत्तर है स्टॉक की कीमतें भी उसी अनुपात में बढ़ जाएगी क्योंकि मार्केट की सबसे बढ़िया 50 शेयरों से मिलकर निफ्टी बना है।


आज निफ़्टी 18 हजार के करीब है,  इसका 6 गुना लगभग 1लाख होता हैं तो सीधी सी बात है स्टॉक का मूल्य भी आज की अपेक्षा लगभग 6 गुना बढ़ानी होगी।


संक्षेप में कहे तो भविष्यवाणी के अनुसार स्टॉक की कीमतें आज की अपेक्षा 6 गुनी बढ़ जाएगी।




अब सबसे महत्वपूर्ण ध्यान देने वाली बात यह है कि यदि यह भविष्यवाणी सच हो भी जाये तो.....


क्या सभी शेयरों का मूल्य 6 गुना तक बढ़ जाएगा ?


नही ऐसा बिल्कुल नही होगा कि सभी शेयरों का मूल्य इतना बढ़ जाये , बल्कि मैं तो कहता हूँ कि निफ़्टी के भी सभी 50 शेयर का मूल्य भी 6 गुना नही होगा। क्योंकि निफ्टी में भी कुछ शेयर ऐसे होते है जो कम रिटर्न देते है और कुछ बहुत ज्यादा।


केवल वही शेयर 6 गुना या उससे अधिक बढ़ेंगे जिन कम्पनियों का बिजनेस मॉडल ऐसा होगा कि वो 2030 तक अपने प्रोडक्ट या सेवा का बहुत ज्यादा मांग निरन्तर बढ़ा सकें।


साथ ही कम्पनी फंडामेंटल स्ट्रॉग हो, निरन्तर अधिक लाभ कमाता हो , कर्ज मुक्त हो या कर्ज मैनेजेबल हो इत्यादि इत्यादि।


निष्कर्ष -

               अंत मे यही कहूंगा की RJ ने ऐसा भविष्यवाणी की है इसलिए क्या मार्केट में निवेश करें , तो बिल्कुल नही अपने खुद के रिसर्च अध्ययन के आधार पर ही निवेश करे या फाइनेंशियल एडवाइसर से सलाह लेकर करे ।


क्योंकि प्रसिद्ध हस्ती भी गलत अनुमान लगा बैठते हैं, वो नुकसान झेल लेंगे लेकिन आम रिटेल निवेशक बड़े नुकसान अक्सर नही झेल पाते।


धन्यवाद।।

सोमवार, 8 नवंबर 2021

क्या भीख मांगना अपराध है | kya Bhikh mangana Aparadh hai?

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 कुछ विशेष परिस्थितियों में व्यक्ति मजबूर होकर जब अपने स्वाभिमान की तिलांजलि दे कर भोजन जैसी न्यूनतम आवश्यकता की वस्तु के लिए अन्य लोगों के समक्ष हाथ फैलता है तो इसे ही भिक्षावृत्ति या भीख मांगना कहते है।


            कम लोगो को जानकारी होगी कि भीख मांगना कानूनन अपराध है तथा इसमे गिरफ्तारी और सजा का प्रावधान है। साथ ही भीख देना भी।


क्या भीख मांगना अपराध है | kya Bhikh mangana Aparadh hai?




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              राज्यो ने भी इसके विरुद्ध एक्ट बनाये हैं जिसे *बेगरी एक्ट* कहते है। पंजाब ,हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार , दिल्ली सहित अन्य राज्यों ने अपने कानून बनाये हैं।



               तो क्या वास्तव में भीख मांगना अपराध है,, देखिये यदि नैतिक दृष्टि से देखे तो मजबूरी की स्थिति में भीख मांगना क्षम्य है यानी ठीक है।



              लेकिन *जनमानस की दयालुता का फायदा उठाकर किसी व्यक्ति के द्वारा भीख मांगने को धंधा या आय का साधन बना लेना निश्चित ही अपराध है।* 



            आमजनता की भावनाओं का गलत लाभ उठाना तो निन्दनीय है ही साथ लोगो को भी ऐसे फर्जी भिखारियों से सजग रहने की जरूरत है,, 



.....क्योंकि जाने अनजाने में ही सही हम अधिकांश फर्जी भिखारियों को भीख देकर भिक्षावृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं।



       यह कटु सत्य है कि इसके लिए आम जनमानस भी उतना ही बड़ा  दोषी है जितना कि वो भिखारी।


धन्यवाद🙏🙏


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नमक का दरोगा का सारांश | Namak ka daroga ka saransh

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*दरोगा वंशीधर* ने जमींदार पण्डित अलोपीदीन को जमुना तट पर अवैध नमक ले जाते पकड़ा।



बेइज्जती से बचने के लिए जमींदार ने लाखों की *घूस* देनी चाही, ईमानदार दरोगा नही माने। 



कोर्ट में ऊँची पहुंच के चलते ज़मीदार न केवल छूट गए बल्कि *दरोगा की नौकरी गई* वह बर्बादी के कगार पर पहुँचा।




   

बाद में जमींदार खुद वंशीधर के घर जाकर उसे ससम्मान अपनी *सम्पूर्ण जायदाद का मैनेजर* बनाता है,



*क्यों???* 🤔🤔🤔



*कारण था ईमानदार आदमी की हर जगह जरूरत होना* 


जमींदार को भी उसके जैसे ईमानदार आदमी की जरुरत थी जो उसके जायदाद की रक्षा कर सके।



-प्रेमचंद लिखित *नमक का दरोगा* का सार


।।धन्यवाद।। 


🙏🙏🙏🙏🙏

एक अदभुत समस्या | Ek adbhut samasya

आइये आज एक ऐसी समस्या के बारे मे चर्चा करते हैं जिससे ग्रस्त प्रायः हर शहर है।


धीरे धीरे यह समस्या ग्रामीण क्षेत्रों की ओर भी बढ़ रही है।


लेकिन आश्चर्य की बात है कि इस समस्या की चर्चा न्यूज़, पेपर, मीडिया तथा सोशल मीडिया में कही भी कभी नहीं होती


,,,, कम से कम मैंने तो नही देखी।


यह समस्या है-


‼️ *निरन्तर ऊपर उठती सड़क और गलियां* ‼️


इससे क्या हानि है, सभी को पता है


हर 10 साल में सड़क के किनारे के दुकानों घरों को ऊपर करना पड़ता है।


धन बर्बाद , 


संसाधन बर्बाद, 


समय बर्बाद ,


व्यापार दुष्प्रभावित ,


नालियां जाम, 


नालियां अत्यधिक नीचे होने से दुर्घटना का डर , 


निरन्तर ऊपर उठते शहर में गरीब असक्षम लोग जो घर ऊपर करने का खर्च नही उठा सकते उन्हें जलभराव का खतरा।





समस्या का निदान -


इस समस्या का एक सरल सुझाव तो यही है कि शासन प्रशासन सड़क व गलियों को नया बनाते समय पुराने रोड या गली को उखाड़कर उसी लेवल में रखे जिसमे वह पहले था।


इसतरह से नया रोड भी बन जायेगा और किनारे के घर और दुकाने नीचे भी नही होगी


अर्थात सड़क व गलियों को ऊपर करना बंद करे इससे काफ़ी सारी समस्या हल हो जाएगी।



समस्या को अदभुत कहने का कारण-


अंत मे इस समस्या को अदभुत कहने का कारण यही है कि इस सम्बन्ध में न्यूज़ मीडिया आदि में हाइलाइट न होना तथा तथा जनमानस द्वारा मांग न करना।


धन्यवाद।।

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उत्साह और अनुभव | Utsah aur Anubhav

जब पुत्र बीस वर्ष का हो जाता है तो पिता के पास जाता है और कहता है कि अब वह बड़ा हो गया है इसलिए व्यवसाय उसे सौप दे।


पिछले तीन वर्षों से काम धंधे में लगातार *हानि* हो रही थी, 


अतः पिता सोचता है कि शायद बेटे के हाथों व्यापार आगे बढ़ जाय,


इसलिए पुत्र को व्यवसाय सौंप कर वह गंगाधाम चले जाते हैं।


साल भर वापस आने पर देखते है कि व्यापार में पहले की अपेक्षा *दोगुनी* हानि हुई है।


पिता अब पुत्र पर क्रोध करने लगता है,, 


इसी दौरान बुजुर्ग पिता का एक मित्र जो कुछ दिनों के लिए उसके घर में मेहमान आये रहता है।


उसे समस्या को समझने में देर नही लगती।


वह पिता को बुलाकर कहता है कि-


 'मित्र तुम बुजुर्ग हो गये हो इसलिए तुम्हारे पास *अनुभव* तो है लेकिन उत्साह की कमी है,, नए सौदे करना ,, व्यापार के नए प्रतिष्ठान स्थापित करना , दौड़ धूप तुमसे नही हो रहा है अतः तुम्हारा व्यवसाय तीन साल तक नुकसान में रहा है।'


            'वही तुम्हारे पुत्र में उत्साह और जोश तो है लेकिन व्यापार में अभी उसे अनुभव की कमी है अतः वह दोगुना नुकसान कर बैठा है।'


 'तुम्हारी समस्या का निदान यही है कि

 पुत्र के हाथों में व्यापार को रहने दो और तुम एक *संरक्षक* की भांति उसे अपने अनुभव का लाभ देते रहो ताकि वह बड़ी गलतियों को करने से बचे।'





फिर उसका मित्र अपने घर चला जाता है। 


और सचमुच कुछ वर्षो बाद पिता पुत्र का व्यवसाय लाभ में आकर उन्नति करने लगा।


निष्कर्ष यह है कि-


*युवा  जोश और प्रौढ़ अनुभव का सामंजस्य कठिन से कठिन कार्य को सफलतापूर्वक कर सकती है* ।

धन्यवाद।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

धैर्य : सोच और हकीकत | Dhairy : Soch aur Hakikat

 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸


किसी बड़े मिशन पर जाने के पहले हो रही प्रशिक्षण का आज आखिरी दिन था,,,


ट्रेनर ने प्रशिक्षुओं को अंतिम पाठ पढ़ाते हुए कहा-


" किसी भी मिशन को पूरा करने के लिए धैर्य सबसे ज्यादा जरूरी है , आप सभी को धैर्य रखना होगा "



सभी ने सहमति में सिर हिलाई ।






ट्रेनर महोदय ने फिर दोहराया-



"किसी भी मिशन को पूरा करने के लिए धैर्य सबसे ज्यादा जरूरी है..


आप सभी को धैर्य रखना होगा"



फिर से कहा -



"किसी भी मिशन को पूरा करने के लिए धैर्य सबसे ज्यादा जरूरी है..


आप सभी को धैर्य रखना होगा"



वही वही बाते सुनकर अब सब बोर गये,,


 एक नौजवान हिम्मत कर उठा और झुँझलाते हुए कहा-



'सर आप बार -बार बात दोहराकर क्यो हमारा समय नष्ट कर रहे हो'?



ट्रेनर ने कहा -


 "मैंने सिर्फ तीन बार अपनी बात दोहराई और तुम नाराज होने लगे .... तो बताओ तुम्हारा वह धैर्य कहाँ गया जिसकी हामी अभी थोड़ी देर पहले तुमने भरी थी।"

अर्थात


धैर्य रखने के बारे में सोचने और वास्तव में धैर्य रखने में बहुत फर्क है।


धन्यवाद🙏🙏

घाट : एक कहानी | Ghat : Ek kahani

एक बार समाजसेवी सज्जन पुरुष नदी में स्नान कर रहे थे, कई लड़के नदी में खेल रहे थे।


तभी एक महिला घाट में स्नान करने आई। पुरुषों के घाट में महिला के आगमन से सभी असहज हुए।


महिला को शायद महिलाओं के घाट कहाँ है?  इसकी जानकारी नहीं है, यह सोचकर सज्जन पुरुष  नजदीक आये और बड़ी विनम्रता से उसे स्त्रियों के घाट के बारे में बताते हुए वहाँ जाकर नहाने का आग्रह किया।


महिला भड़क उठी , उसने कहा मैं यही स्नान करूंगी। जैसे- जैसे सज्जन पुरुष उस महिला को समझाते वे और उग्र होते जाती ,, .


थक हारकर पुरूष ने अपनी राह ली।




अब चूंकि पुरूष समाजसुधारक थे अतः महिला के इस व्यवहार से चिंतित थे,,,


.. क्योंकि इससे एक नई गलत प्रथा का प्रचलन हो सकता था।


अतः वह शाम को उस महिला के घर के लोगों को घाट में हुई बात बताई और उन्हें समझाने लगे लेकिन अप्रत्याशित रूप से घर के लोगो ने पुरूष को लताड़ लगाई और भगा दिया।


समाजसेवा में अच्छे बुरे सभी तरह के लोगो से घुट चुके सज्जन पुरुष ने सोचा कि महिला और उसके घर के लोग अभी गुस्से में है इसलिए उनसे कुछ दिनों बाद बात करनी चाहिए।


माह भर बाद ...सज्जन पुरुष ने अपने साथ समाज के कुछ प्रभावशाली लोगो को लेकर महिला के घर गये और उन्हें समझाने लगे।


 लेकिन इस बार उसके घर के लोगों ने धमकी देते हुए कहा कि- 'हमे तंग करना बंद करो ,, हम जैसा कर रहे हैं वैसा ही करते रहेंगे और अब घर मे आये तो पुलिस में महिला प्रताड़ना का रिपोर्ट कर देंगे।'


उक्त विवरण हमे यह बताती है कि-


 आप चाहे कितना भी विद्वान हो,

 विनम्र हो, 

लोगों को समझाने और जागरूक करने की शक्ति रखते हों,


...... ..लेकिन समाज मे चंद लोग ऐसे मिलेंगे ही जिसे कोई भी कितना भी दिमाग लगाये ,धैर्य दिखाये उसे नही सुधार सकता ,नही समझा सकता।


ऐसे लोग तभी समझते हैं


  "जब उनके साथ कोई गम्भीर घटना हो जाये जो उसे मानसिक रूप से झकझोर दे या उनके नई पीढ़ी के बच्चे शिक्षित होकर सभ्य लोगो के सम्पर्क में आये।"


ऐसे बुरे अनुभव ही हमे शिक्षा का महत्व समझाती है...


......क्योंकि शिक्षा न केवल समझ विकसित करती है बल्कि कई बार तो नई समझ भी पैदा करती है।


धन्यवाद।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏

हम दो हमारे दो | Ham Do Hamare Do


 किसी ने कहा- 'हम दो मियां - बीवी  हमारे दो बच्चे ठीक है, इससे जनसंख्या नहीं बढ़ेगी ..


 क्या हकीकत में  'हम दो हमारे दो' से जनसंख्या नही बढ़ेगी ?

🤔🤔🤔


 *आइये देखते है* 


 एक गांव में  100 लोग रहते हैं 


 उसमें 50 स्त्री 50 पुरूष, वे 'हम दो हमारे दो' के नियम से का पालन करते हैं।


 सभी के दो बच्चे होते हैं तो बच्चों की संख्या 100 होगी औऱ...


 *गाँव की कुल जनसंख्या 100 से बढ़कर *200* हो जाएगी* 


 यानि जनसंख्या दोगुना हो गया

🥈🥈🥈🥈


 असल मे 'हम दो हमारे दो'  के पीछे तर्क यह था दो लोग के बदले में दो बच्चे उनका स्थान लेंगे,,


 लेकिन यह तभी संभव है जब दो बच्चे आने के बाद माता- पिता नही रहेंगे


 सामान्यतः 35-40 वर्ष की आयु तक माता पिता के दो बच्चे हो जाते है। इसके बाद भी करीब 30 वर्ष तक वे बच्चों के साथ इस दुनिया में रहते हैं।





 अतः 'हम दो हमारे दो' की नीति जनसंख्या को कम करने में असफल रही।


 यही कारण है कि चीन सहित कई देशों ने 'हम दो हमारे एक' की नीति अपनाई।


 उक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि 'हम दो हमारे दो' की नीति जनसंख्या कम नहीं करती बल्कि आरम्भ में दोगुनी करने के साथ 30-40 वर्षो बाद दूसरी पीढ़ी में जनसंख्या को केवल नियंत्रित करती है।


अर्थात जब तक हम दो हमारे दो के द्वारा जनसंख्या नियंत्रण में आये तब तक तो स्थिति भयावह हो सकती है





 हमारे देश मे संसाधन सीमित है यानी जल, जमीन, वन, रोजगार, भौतिक सुविधा इत्यादि बहुत कम है..


..जबकि लोग बहुत ज्यादा है अतः यहाँ जनसंख्या को कम करने की जरूरत है जिसके लिए 'हम दो हमारे एक' की नीति को कठोरता से अपनानी होगी।


 लेकिन भारत जैसे बेहद विविधता पूर्ण देश में 'हम दो हमारे एक' का पालन असम्भव प्रतीत होता हैं.....

😙😙😙


....क्योंकि यहाँ के अधिकांश लोग 'मर जायेंगे पर नही सुधरेंगे की नीति ' का कठोरता से पालन करते हैं।**


 *_धन्यवाद_* 

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मंगलवार, 2 नवंबर 2021

क्यों भगत सिंह की विचारधारा की अपेक्षा उसके शहादत की ज्यादा चर्चा होती है ? || Kyo Bhagat singh ki vichar dhara ki apeksha usake shahadat ki jyada charcha hoti hai

 इस प्रश्न को मैं दो हिस्सों में करके चर्चा करना चाहूंगा-


1.भगत सिंह पर चर्चा-

स्वतंत्रता सेनानी के शहादत से लोगो का प्रभावित होना स्वभाविक है

क्योंकि ऐसी भावनाएं स्वतः ही दिल से निकलती है। हम ऐसे विषय से बहुत ज्यादा इमोशनली जुड़े होते है।


यानि किसी व्यक्ति को शहादत के सम्बंध में बातचीत करने में ज्यादा सोचने विचरने या माथापच्ची करने की जरूरत नहीं पड़ती , लोग इसका समर्थन भी करते है।


आप धारा प्रवाह अपनी विचार अभिव्यक्ति कर सकते है।


2. भगतसिंह की विचारधारा पर चर्चा-


शहीद की विचारधारा के विभिन्न पहलू जो राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक या अन्य विषयों को छूता हो , इस पर चर्चा करने की क्षमता कम लोगो मे होती है ।

क्योंकि इन विषयों पर चर्चा करने की मानसिक समझ और योग्यता आवश्यकता होती है ।


एक अनुमान के अनुसार विश्व में केवल 5 % लोग की समझदार होते है।


साथ ही राजनितिक, सामाजिक , धार्मिक मुद्दे गंभीर विषयो की श्रेणी में आता है हल्की सी चूक कठोर आलोचना होने लगती है।


अतः गूढ़ विषयों पर चर्चा के लिए लोगो की उपलब्धता कम होती है।


वैसे भगत सिंह समानता पर  सोशलिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे। 



निष्कर्ष यह है कि हमे व्यक्ति पूजा से बचकर उसके विचारधारा के अध्ययन पर जोर देना चाहिए और यदि सही लगे तो उसे व्यवहारिक रूप से अपनाने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि…


… भगतसिंह से महान उसकी वह विचारधारा है जो उसे भारत का सबसे महानतम शहीद बनाया।


जयहिंद🙏🙏

सोमवार, 1 नवंबर 2021

अच्छे लोग - बुरे लोग | Achche log - Bure log

धरती में मनुष्य समाज बनाकर रहते है। समाज मे अच्छे- बुरे सभी लोग निवास करते हैं। 

सामान्यतः समाज में एक मापदंड ऐसा बन गया है कि जिसके अनुरूप आचरण करने के आधार पर ही लोगो को अच्छा या बुरा माना जाता है। 


यह मापदंड कितना सही है? कहाँ तक सही है? इन बातो का विश्लेषण करना भी आवश्यक है।


यहाँ पर उक्त मापदंड का विचलन जानने के लिए आइये एक कथा - प्रसंग को देखते हैं।


कथा प्रसंग


एक गाँव में श्री मान  रहते थे।नित्य सुबह उठकर स्नान आदि के बाद पूजापाठ धर्मग्रंथों का अध्ययन करते, इसके बाद ही अपने नियमित काम मे लगते थे। 


इसका मुख्य कार्य सत्संग, भगवत कथा व धार्मिक आयोजनों के वाचक और कर्ताधर्ता के रूप में था। 

वाकपटु और मृदुभाषी होने के कारण जनता को आकर्षित करने के क्षमता थी। अतः दानदाता उनके आदेश पर इस तरह के आयोजन के लिए उत्सुक रहते थे


महाशय खानपान में मांस -मदिरा से दूर रहते, सप्ताह में दो दिन का उपवास रखते साथ ही बीच बीच मे आने वाले धार्मिक पर्वो के अवसरो पर कठोर उपवास करते जिसमे फलाहार के पूर्व वह जल की एक बूँद भी अपने मुंह मे नहीं ले जाते।


अ का जीवन अच्छा चल रहा था , अपने गाँव सहित आसपास के क्षेत्रों में उसकी धूम मची थी।


लेकिन कुछ बातो को लेकर हमेशा सजग रहते थे। जैसे किसी से उनका सम्बन्ध खराब न हो अतः वह ग्राम पंचायत में विकास के मुद्दे, किसी के झगड़े निपटारे आदि के पचड़ों में नही पड़ता थे। अपनी छबि ख़राब न हो, कोई उस पर अंगुली न उठा सके इस बात का भलीभांति ध्यान रखते थे।


उसी गांव में  महोदय भी रहा करते थे। कभी अ के सहपाठी रह चुके ब आज गाँव में ही दुकान चलाया करते थे। खानपान में मांस-मछली भी खाते थे। 

कम पढ़ा लिखा था लेकिन बातचीत में सामान्य, लेकिन बेहिचक बोलने वाला व्यक्ति था। अतः लोग उसे अपने मामलो में सुलह समझौते करवाने के लिए भी ले जाते थे।


एक बार पास के गाँव में घार्मिक आयोजन में शामिल होने गया था। कथाकार  सुना रहे थे कि एक शेर हिरण का पीछा कर रहा था। हिरण जंगल में दौड़ लगाते हुए भालू के पास पहुंचा , हिरण ने भालू से कहा मुझे यही कही छुपा लो , भालू शेर के डर से उसे मना कर दिया।

 

इसीतरह हिरण कई जानवरों के पास गया लेकिन उसे कही शरण नही मिली और अंत में एक छोटी चिड़िया ने हिरण को छुपने के लिए एक गुफ़ा बताई जहां शेर आता जाता नही था तब हिरण की जान बची।

अच्छे लोग - बुरे लोग | Achche log - Bure log


कथावाचक ने अब सार बताया कि जब एक छोटी चिड़िया अपने से बड़े जीव जंतुओं की सहायता कर सकती है तब हम मानव होकर क्यो नही एक दूसरे की सहायता कर सकते हैं?

सत्संग खत्म हुआ वापस लौटा, लेकिन उसके मन में शेर और हिरण वाली कहानी घर कर गईं थीं।


अगले दिन से वह हर तरह से लोगो की सहायता के लिए अवसर ढूंढने लगा। कुछ दिन मन्दिर के पास के भिखारियों को दान देकर उसकी स्थिति सुधारने की कोशिश की, लेकिन वह जल्द ही समझ गया कि इन्हें सीधे धन देना ठीक नहीं है क्योंकि इन्होने इसे व्यवसाय बना लिया है। अतः इन्हें आजीविका का साधन उपलब्ध कराना जरूरी है।


  ने सभी भिखारियों को इकट्ठा कर इस बारे में बात की ज्यादातर उनकी बात मानने को तैयार हो गए लेकिन कुछ को भीख मांगना ही अच्छा काम लगता था अतः वे दूसरे काम करने को राजी नहीं हुए।

अब उसने गाँव के गरीब लोगों के बारे में सोचा कि कैसे उनकी गरीबी दूर करे , 


उसने पंचायत प्रमुख से बात की जिसने बताया कि गाँव के अधिकतर लोग कृषि, मजदूरी और अकुशल शारीरिक श्रम करते है। लोगो को अनेक रोजगार व स्वरोजगार का प्रशिक्षण देने की शासन की योजना चल रही है लेकिन लोग बिल्कुल भी रुची नही लेते। वे तो पंचायत की बैठक में भी सहभागी तक नहीं होते।


अभी तक लोगो की छोटी मोटी सहायता कर कुछ विश्वास अर्जन कर चुका था अतः गाँव के गरीब लोगों को खाली समय मे प्रशिक्षण लेने की बात कही तो वो तैयार हो गए। इस प्रशिक्षण में भिखारियों को भी शामिल किया गया।


ब गाँव में मूलभूत सुविधाओं जैसे विद्यालय, चिकित्सालय, पेयजल, साफ सफाई, बिजली सड़क इत्यादि की उपलब्धता के लिए मांग करने ग्राम प्रधान के साथ सरकारी कार्यालय जाने। लोगो को सभी सुविधाएं नियमित रूप से बिना भ्रष्टाचार के कैसे अच्छे से मिले इसके लिए भी प्रयास करने लगा।


जरूरतमंद लोगों की यथा संभव सीधे सहायता भी करता था, जैसे कोई नंगे पैर चल रहा है तो चप्पलें दे देना, ठंड में कम्बले, गर्मी में किसी के यहाँ  पँखा दे देना।किसी बच्चे की कॉलेज शिक्षा के लिए फीस देना इत्यादि।


सीधी सहायता में ब ने इस बात का ध्यान रखा कि धन सुपात्र को मिले, कुपात्र को नही। यानि जो असक्षम है उनकी सहायता की।


इन सब से लोगो का जीवन स्तर जरूर सुधरा लेकिन वे गरीबी से अब भी उबर नही पाये थे, ने भी इसे महसूस किया। 


उसने बारीकी से ध्यान दिया तो पाया कि लोग धार्मिक और सामाजिक कार्यो में गरीब होने के बाद भी अपनी काफी जमा पूंजी खर्च कर डालते थे , जैसे -विवाह , दहेज, मृत्युभोज, जन्म संस्कार, गृहप्रवेश और इसीतरह के अन्य रीति रिवाजों में भी। साथ ही लोग कई अंधविश्वास में भी फँसे रहते थे । धार्मिक आयोजन, त्योहार में भी लोग अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करते थे।


ने लोगो को समझाया की 'इन सब मे कुछ मात्रा में खर्च करना तो ठीक है लेकिन इतना ज्यादा खर्च मत करो कि कर्ज में डूब जाओ या अपनी जमा पूंजी नष्ट कर बैठो। वही अंधविश्वास और कुप्रथाओं पर तो बिल्कुल खर्च मत करो।'


लेकिन कुछ ही लोगों ने उसकी बात को समझा, क्योंकि....


 धार्मिक एवं सामाजिक जागरण एक लंबी प्रक्रिया है जिसे लोग समझते समझते ही समझ पाते है।


खैर ने आगामी कई वर्षो तक जनहित के कार्य किये जिससे उसके गाँव की अच्छी स्थिति देखकर आसपास के गाँव से लोग सलाह मशविरे के लिए आने लगे। अपने काम को पूरे क्षेत्र में बढ़ाने को लेकर उत्सुक थे।


के जनहित के कार्यो के चलते कुछ लोग नाराज भी थे, जैसे ग्रामस्तर के भ्रष्ट कर्मचारी, कुछ राजनीति करने वाले लोग, धर्म एवं रीति रिवाज के कट्टर समर्थक लोग और अंधविश्वास से जुड़े लोग।


इधर अ अब बुढ़ा होने को चला था अपने अंतिम वर्षो में उसने भजन कीर्तन की संख्या बढ़ा दी। अब चैबीस घण्टे उसका समय मन्त्र जाप में ही बीतता।


जीवन का अंतिम समय निकट जान ने गाँव मे सत्संग आयोजन किया और घोषणा किया कि यह उनका अंतिम सत्संग है अतः श्रद्धालुगण दूर दूर से आये, खूब भीड़ उमड़ रही थी। आयोजन में गाँव के सभी गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।


तभी घोर की गर्जना के साथ ना जाने कहा से काले बादल छा गए, अचानक मौसम के बदलाव से भयभीत लोग ऊपर की ओर देख रहे थे, तभी एक दिव्य प्रकाशित रथ पर बैठे देवदूत आकाश में प्रकट हुए। लोगो के रोंगटे खड़े हो गए क्योंकि उन्होंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था।


देवदूत नीचे आये , भीड़ अभी भी उसे एक टक देख रही थी , उसने भीड़ की ओर हाथ जोड़कर कहा - 'हे महान आत्मा आपको लेने के लिए  साक्षात परमपिता ने मुझको भेजा है।'


यह सुनकर लोग की जय जयकार करने लगे , लोगो की भीड़ ने को आगे बढ़ने के लिये जगह दिया।

अभी रथ में बैठने के लिए उस ओर प्रस्थान कर ही रहा था कि देवदूत विनम्रता से बोले - 'महोदय ! आपको नही, मुझे को ले जाने के लिए भेजा गया है।' दरअसल देवदूत ने भीड़ में खड़ेकी ओर इशारा किया था।


 देवदूत से यह बात सुनकर सारे लोग सकते में आ गए। ऐसा कैसे हो सकता है? लोग खुसफुसाने लगे।

ने पुनः देवदूत से विनती किया कि जरूर उसे गलतफहमी हो रही है लेकिन देवदूत अपनी बात पर अड़ा रहा। 


अब की सहनशक्ति खत्म हो गई , वह ऊपर आकाश की ओर कलप कर पूछा कि 'उसकी भक्ति आराधना में कहाँ पर कमी रही थी जो उसे छोड़कर एक धर्मभ्रष्ट व्यक्ति को देवदूत लिए जा रहा है।'


इस बार एक तीव्र प्रकाश का आभामण्डल दिखाई दिया और आकाशवाणी हुई। आकाशवाणी सुनकर सभी के भ्रम दूर हो गये। कुछ देर बादको देवदूत रथ में बिठाकर आकाश में विलीन हो गए।


कथा प्रसंग आसान है, निश्चित रूप से आपके भ्रम भी दूर हो गए होंगे, जिनका भ्रम दूर नही हुआ उनके लिए कहना चाहूंगा कि -

केवल उपदेश देने से कुछ नही होता, उसका क्रियान्वयन महत्वपूर्ण है।

 

अर्थात कोई व्यक्ति खुद की छबि सभी जगह अच्छा बना रहे , सभी से सम्बंध हमेशा अच्छा बना रहे, यह सोचकर मानवता की बात भी न उठाता हो, न कभी जनकल्याण में  शामिल होता हो, तो उसके द्वारा कितना भी पूजापाठ आध्यात्मिक कार्य कर लिया जाये मानवतावादी व्यक्ति से नीचे ही रहेगा।


समाज द्वारा बनाये गये अच्छे और बुरे लोगो के पहचान का मापदंड मुख्यतः खानपान, पूजापाठ, मीठी बोली,अच्छी छबि, अच्छा सम्बन्ध, व्यवहार तक ही सीमित है, इन्ही तत्वों को अधिक मान्यता दी जाती है। जबकि मानवीय सहयोग की उपेक्षा कर दी जाती है।


ऐसा नही है कि ये तत्व बुरे है , इनका भी प्रभाव है, लेकिन सीमित है जिसे लोग जरूरत से ज्यादा महिमामंडन करने लगते हैं।

उक्त तत्वों में जो व्यक्ति पारंगत हो उसे अच्छा और शेष को बुरा घोषित कर दिया जाता है।

प्रस्तुत प्रसंग में अ एक जगह कथा सुनाते वक्त " मानव के आपसी सहयोग का उपदेश देते है लेकिन स्वंय पालन नहीं करते वही इसी प्रसंग ने ब का जीवन बदल दिया, जिसके कारण वह अंत मे परम् तत्व को प्राप्त हुआ।"

  • संलग्न चित्र केवल प्रतीकात्मक

धन्यवाद।

सबसे ज्याद जरूरी काम || Sabse jyada jaruri kam

भोलू हर रोज की तरह अपने पान ठेले पर बैठा पान बना रहा था। उसी समय एक कार आकर ठेले के पास रुका उसमें से सूट पहने एक आदमी गाड़ी के काँच को नीचे ...