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पिछले दिनों कोविड के फैलाव के कारण एक शब्द ‘ *Bubble* ’ बहुत चर्चित हुआ। हिंदी में उसे ‘बुलबुला’ कह सकते हैं।
एक ही प्रकार के उद्देश्य साधने वाले कुछ लोगों या परिवारों ने कोविड की सावधानियाँ रखते हुए,,, बाक़ी दुनिया से सभी प्रकार की वांछित दूरी रखते हुए, छोटे -छोटे समूह बना लिए और समुचित सावधानियों के साथ आपस में मेल मिलाप और सहयोग जारी रखा...
...ऐसे समूहों को Bubble या बुलबुला कहा जाता है।
अपने जीवन काल में इंसान जाने-अनजाने निम्नलिखित प्रकार के अनेकों बुलबुलों का हिस्सा बनता रहता है।
उदाहरणार्थ, मैं जिन बुलबुलों का हिस्सा हूँ उनमें से कुछ निम्न लिखित हैं :-
🔵 मेरा परिवार के सदस्य,
🔵 मेरी मित्र मंडली,
🔵 मेरे ऑफ़िस के लोग,
🔵 मेरे जैसे व्यवसायी,
🔵 मेरे WhatsApp ग्रुप के सदस्य,
🔵 मेरे आस-पड़ोस के लोग,
🔵 मेरे हम-वतन,
🔵 मेरी दुनिया के लोग,
आदि, आदि।
राग-द्वेष के प्रकरण को अपने जीवन के अनुभवों से जोड़ता हूँ तो पाता हूँ कि हमें राग और द्वेष उन्हीं लोगों से या वस्तुओं से होता है जो उस बुलबुले (Bubble) के अंदर हैं जिसमें मैं हूँ।
बुलबुले के बाहर क्या हो रहा है, उसकी जानकारी होते हुए भी मेरा राग-द्वेष नहीं उभरता,,, क्योंकि मुझे उनसे कोई सरोकार या अपेक्षा नहीं होती। अपने बुलबुले के सदस्यों से मुझे कोई न कोई अपेक्षा होती है।
दर असल जैसे ही हम किसी से कोई अपेक्षा रखते हैं, वह हमारे किसी न किसी बुलबुले का हिस्सा बन जाता है और हमारे राग या द्वेष का पात्र भी बन जाता है।
अपेक्षा की पूर्ति होती रहे तो राग (प्रेम, स्नेह, दोस्ती, प्रशंसा, आसक्ति आदि) बना रहता है और अपेक्षा पूर्ति न हो तो द्वेष (वैर भाव, घृणा, नफ़रत, ईर्ष्या, चिढ़ आदि) उत्पन्न हो जाता है।
मेरे बुलबुले के लोग मेरे लिए बदलने वाले नहीं हैं; परंतु निरंतर प्रयत्न करने पर मैं स्वयं को बदल सकता हूँ और अपने राग-द्वेष को नियंत्रित कर सकता हूँ।
इसके लिए मुझे उनसे उतनी ही अपेक्षा रखनी है जितनी अपेक्षा मैं बुलबुले से बाहर के लोगों से रखता हूँ जो कि नही के बराबर है।
अर्थात *निरालंबी* बनना है।
धन्यवाद।।
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