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*दरोगा वंशीधर* ने जमींदार पण्डित अलोपीदीन को जमुना तट पर अवैध नमक ले जाते पकड़ा।
बेइज्जती से बचने के लिए जमींदार ने लाखों की *घूस* देनी चाही, ईमानदार दरोगा नही माने।
कोर्ट में ऊँची पहुंच के चलते ज़मीदार न केवल छूट गए बल्कि *दरोगा की नौकरी गई* वह बर्बादी के कगार पर पहुँचा।
बाद में जमींदार खुद वंशीधर के घर जाकर उसे ससम्मान अपनी *सम्पूर्ण जायदाद का मैनेजर* बनाता है,
*क्यों???* 🤔🤔🤔
*कारण था ईमानदार आदमी की हर जगह जरूरत होना*
जमींदार को भी उसके जैसे ईमानदार आदमी की जरुरत थी जो उसके जायदाद की रक्षा कर सके।
-प्रेमचंद लिखित *नमक का दरोगा* का सार
।।धन्यवाद।।
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