धरती में मनुष्य समाज बनाकर रहते है। समाज मे अच्छे- बुरे सभी लोग निवास करते हैं।
सामान्यतः समाज में एक मापदंड ऐसा बन गया है कि जिसके अनुरूप आचरण करने के आधार पर ही लोगो को अच्छा या बुरा माना जाता है।
यह मापदंड कितना सही है? कहाँ तक सही है? इन बातो का विश्लेषण करना भी आवश्यक है।
यहाँ पर उक्त मापदंड का विचलन जानने के लिए आइये एक कथा - प्रसंग को देखते हैं।
कथा प्रसंग
एक गाँव में श्री मान अ रहते थे।नित्य सुबह उठकर स्नान आदि के बाद पूजापाठ धर्मग्रंथों का अध्ययन करते, इसके बाद ही अपने नियमित काम मे लगते थे।
इसका मुख्य कार्य सत्संग, भगवत कथा व धार्मिक आयोजनों के वाचक और कर्ताधर्ता के रूप में था।
वाकपटु और मृदुभाषी होने के कारण जनता को आकर्षित करने के क्षमता थी। अतः दानदाता उनके आदेश पर इस तरह के आयोजन के लिए उत्सुक रहते थे
अ महाशय खानपान में मांस -मदिरा से दूर रहते, सप्ताह में दो दिन का उपवास रखते साथ ही बीच बीच मे आने वाले धार्मिक पर्वो के अवसरो पर कठोर उपवास करते जिसमे फलाहार के पूर्व वह जल की एक बूँद भी अपने मुंह मे नहीं ले जाते।
अ का जीवन अच्छा चल रहा था , अपने गाँव सहित आसपास के क्षेत्रों में उसकी धूम मची थी।
लेकिन कुछ बातो को लेकर हमेशा सजग रहते थे। जैसे किसी से उनका सम्बन्ध खराब न हो अतः वह ग्राम पंचायत में विकास के मुद्दे, किसी के झगड़े निपटारे आदि के पचड़ों में नही पड़ता थे। अपनी छबि ख़राब न हो, कोई उस पर अंगुली न उठा सके इस बात का भलीभांति ध्यान रखते थे।
उसी गांव में ब महोदय भी रहा करते थे। कभी अ के सहपाठी रह चुके ब आज गाँव में ही दुकान चलाया करते थे। खानपान में मांस-मछली भी खाते थे।
ब कम पढ़ा लिखा था लेकिन बातचीत में सामान्य, लेकिन बेहिचक बोलने वाला व्यक्ति था। अतः लोग उसे अपने मामलो में सुलह समझौते करवाने के लिए भी ले जाते थे।
एक बार ब पास के गाँव में घार्मिक आयोजन में शामिल होने गया था। कथाकार अ सुना रहे थे कि एक शेर हिरण का पीछा कर रहा था। हिरण जंगल में दौड़ लगाते हुए भालू के पास पहुंचा , हिरण ने भालू से कहा मुझे यही कही छुपा लो , भालू शेर के डर से उसे मना कर दिया।
इसीतरह हिरण कई जानवरों के पास गया लेकिन उसे कही शरण नही मिली और अंत में एक छोटी चिड़िया ने हिरण को छुपने के लिए एक गुफ़ा बताई जहां शेर आता जाता नही था तब हिरण की जान बची।
सत्संग खत्म हुआ ब वापस लौटा, लेकिन उसके मन में शेर और हिरण वाली कहानी घर कर गईं थीं।
अगले दिन से वह हर तरह से लोगो की सहायता के लिए अवसर ढूंढने लगा। कुछ दिन मन्दिर के पास के भिखारियों को दान देकर उसकी स्थिति सुधारने की कोशिश की, लेकिन वह जल्द ही समझ गया कि इन्हें सीधे धन देना ठीक नहीं है क्योंकि इन्होने इसे व्यवसाय बना लिया है। अतः इन्हें आजीविका का साधन उपलब्ध कराना जरूरी है।
ब ने सभी भिखारियों को इकट्ठा कर इस बारे में बात की ज्यादातर उनकी बात मानने को तैयार हो गए लेकिन कुछ को भीख मांगना ही अच्छा काम लगता था अतः वे दूसरे काम करने को राजी नहीं हुए।
अब उसने गाँव के गरीब लोगों के बारे में सोचा कि कैसे उनकी गरीबी दूर करे ,
उसने पंचायत प्रमुख से बात की जिसने बताया कि गाँव के अधिकतर लोग कृषि, मजदूरी और अकुशल शारीरिक श्रम करते है। लोगो को अनेक रोजगार व स्वरोजगार का प्रशिक्षण देने की शासन की योजना चल रही है लेकिन लोग बिल्कुल भी रुची नही लेते। वे तो पंचायत की बैठक में भी सहभागी तक नहीं होते।
ब अभी तक लोगो की छोटी मोटी सहायता कर कुछ विश्वास अर्जन कर चुका था अतः गाँव के गरीब लोगों को खाली समय मे प्रशिक्षण लेने की बात कही तो वो तैयार हो गए। इस प्रशिक्षण में भिखारियों को भी शामिल किया गया।
ब गाँव में मूलभूत सुविधाओं जैसे विद्यालय, चिकित्सालय, पेयजल, साफ सफाई, बिजली सड़क इत्यादि की उपलब्धता के लिए मांग करने ग्राम प्रधान के साथ सरकारी कार्यालय जाने। लोगो को सभी सुविधाएं नियमित रूप से बिना भ्रष्टाचार के कैसे अच्छे से मिले इसके लिए भी प्रयास करने लगा।
ब जरूरतमंद लोगों की यथा संभव सीधे सहायता भी करता था, जैसे कोई नंगे पैर चल रहा है तो चप्पलें दे देना, ठंड में कम्बले, गर्मी में किसी के यहाँ पँखा दे देना।किसी बच्चे की कॉलेज शिक्षा के लिए फीस देना इत्यादि।
सीधी सहायता में ब ने इस बात का ध्यान रखा कि धन सुपात्र को मिले, कुपात्र को नही। यानि जो असक्षम है उनकी सहायता की।
इन सब से लोगो का जीवन स्तर जरूर सुधरा लेकिन वे गरीबी से अब भी उबर नही पाये थे, ब ने भी इसे महसूस किया।
उसने बारीकी से ध्यान दिया तो पाया कि लोग धार्मिक और सामाजिक कार्यो में गरीब होने के बाद भी अपनी काफी जमा पूंजी खर्च कर डालते थे , जैसे -विवाह , दहेज, मृत्युभोज, जन्म संस्कार, गृहप्रवेश और इसीतरह के अन्य रीति रिवाजों में भी। साथ ही लोग कई अंधविश्वास में भी फँसे रहते थे । धार्मिक आयोजन, त्योहार में भी लोग अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करते थे।
ब ने लोगो को समझाया की 'इन सब मे कुछ मात्रा में खर्च करना तो ठीक है लेकिन इतना ज्यादा खर्च मत करो कि कर्ज में डूब जाओ या अपनी जमा पूंजी नष्ट कर बैठो। वही अंधविश्वास और कुप्रथाओं पर तो बिल्कुल खर्च मत करो।'
लेकिन कुछ ही लोगों ने उसकी बात को समझा, क्योंकि....
धार्मिक एवं सामाजिक जागरण एक लंबी प्रक्रिया है जिसे लोग समझते समझते ही समझ पाते है।
खैर ब ने आगामी कई वर्षो तक जनहित के कार्य किये जिससे उसके गाँव की अच्छी स्थिति देखकर आसपास के गाँव से लोग सलाह मशविरे के लिए आने लगे। ब अपने काम को पूरे क्षेत्र में बढ़ाने को लेकर उत्सुक थे।
ब के जनहित के कार्यो के चलते कुछ लोग नाराज भी थे, जैसे ग्रामस्तर के भ्रष्ट कर्मचारी, कुछ राजनीति करने वाले लोग, धर्म एवं रीति रिवाज के कट्टर समर्थक लोग और अंधविश्वास से जुड़े लोग।
इधर अ अब बुढ़ा होने को चला था अपने अंतिम वर्षो में उसने भजन कीर्तन की संख्या बढ़ा दी। अब चैबीस घण्टे उसका समय मन्त्र जाप में ही बीतता।
जीवन का अंतिम समय निकट जान अ ने गाँव मे सत्संग आयोजन किया और घोषणा किया कि यह उनका अंतिम सत्संग है अतः श्रद्धालुगण दूर दूर से आये, खूब भीड़ उमड़ रही थी। आयोजन में गाँव के सभी गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
तभी घोर की गर्जना के साथ ना जाने कहा से काले बादल छा गए, अचानक मौसम के बदलाव से भयभीत लोग ऊपर की ओर देख रहे थे, तभी एक दिव्य प्रकाशित रथ पर बैठे देवदूत आकाश में प्रकट हुए। लोगो के रोंगटे खड़े हो गए क्योंकि उन्होंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था।
देवदूत नीचे आये , भीड़ अभी भी उसे एक टक देख रही थी , उसने भीड़ की ओर हाथ जोड़कर कहा - 'हे महान आत्मा आपको लेने के लिए साक्षात परमपिता ने मुझको भेजा है।'
यह सुनकर लोग अ की जय जयकार करने लगे , लोगो की भीड़ ने अ को आगे बढ़ने के लिये जगह दिया।
अभी अ रथ में बैठने के लिए उस ओर प्रस्थान कर ही रहा था कि देवदूत विनम्रता से बोले - 'महोदय ! आपको नही, मुझे ब को ले जाने के लिए भेजा गया है।' दरअसल देवदूत ने भीड़ में खड़े ब की ओर इशारा किया था।
देवदूत से यह बात सुनकर सारे लोग सकते में आ गए। ऐसा कैसे हो सकता है? लोग खुसफुसाने लगे।
अ ने पुनः देवदूत से विनती किया कि जरूर उसे गलतफहमी हो रही है लेकिन देवदूत अपनी बात पर अड़ा रहा।
अब अ की सहनशक्ति खत्म हो गई , वह ऊपर आकाश की ओर कलप कर पूछा कि 'उसकी भक्ति आराधना में कहाँ पर कमी रही थी जो उसे छोड़कर एक धर्मभ्रष्ट व्यक्ति को देवदूत लिए जा रहा है।'
इस बार एक तीव्र प्रकाश का आभामण्डल दिखाई दिया और आकाशवाणी हुई। आकाशवाणी सुनकर सभी के भ्रम दूर हो गये। कुछ देर बाद ब को देवदूत रथ में बिठाकर आकाश में विलीन हो गए।
कथा प्रसंग आसान है, निश्चित रूप से आपके भ्रम भी दूर हो गए होंगे, जिनका भ्रम दूर नही हुआ उनके लिए कहना चाहूंगा कि -
केवल उपदेश देने से कुछ नही होता, उसका क्रियान्वयन महत्वपूर्ण है।
अर्थात कोई व्यक्ति खुद की छबि सभी जगह अच्छा बना रहे , सभी से सम्बंध हमेशा अच्छा बना रहे, यह सोचकर मानवता की बात भी न उठाता हो, न कभी जनकल्याण में शामिल होता हो, तो उसके द्वारा कितना भी पूजापाठ आध्यात्मिक कार्य कर लिया जाये मानवतावादी व्यक्ति से नीचे ही रहेगा।
समाज द्वारा बनाये गये अच्छे और बुरे लोगो के पहचान का मापदंड मुख्यतः खानपान, पूजापाठ, मीठी बोली,अच्छी छबि, अच्छा सम्बन्ध, व्यवहार तक ही सीमित है, इन्ही तत्वों को अधिक मान्यता दी जाती है। जबकि मानवीय सहयोग की उपेक्षा कर दी जाती है।
ऐसा नही है कि ये तत्व बुरे है , इनका भी प्रभाव है, लेकिन सीमित है जिसे लोग जरूरत से ज्यादा महिमामंडन करने लगते हैं।
उक्त तत्वों में जो व्यक्ति पारंगत हो उसे अच्छा और शेष को बुरा घोषित कर दिया जाता है।
प्रस्तुत प्रसंग में अ एक जगह कथा सुनाते वक्त " मानव के आपसी सहयोग का उपदेश देते है लेकिन स्वंय पालन नहीं करते वही इसी प्रसंग ने ब का जीवन बदल दिया, जिसके कारण वह अंत मे परम् तत्व को प्राप्त हुआ।"
- संलग्न चित्र केवल प्रतीकात्मक
धन्यवाद।

बहुत अच्छा
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