जब पुत्र बीस वर्ष का हो जाता है तो पिता के पास जाता है और कहता है कि अब वह बड़ा हो गया है इसलिए व्यवसाय उसे सौप दे।
पिछले तीन वर्षों से काम धंधे में लगातार *हानि* हो रही थी,
अतः पिता सोचता है कि शायद बेटे के हाथों व्यापार आगे बढ़ जाय,
इसलिए पुत्र को व्यवसाय सौंप कर वह गंगाधाम चले जाते हैं।
साल भर वापस आने पर देखते है कि व्यापार में पहले की अपेक्षा *दोगुनी* हानि हुई है।
पिता अब पुत्र पर क्रोध करने लगता है,,
इसी दौरान बुजुर्ग पिता का एक मित्र जो कुछ दिनों के लिए उसके घर में मेहमान आये रहता है।
उसे समस्या को समझने में देर नही लगती।
वह पिता को बुलाकर कहता है कि-
'मित्र तुम बुजुर्ग हो गये हो इसलिए तुम्हारे पास *अनुभव* तो है लेकिन उत्साह की कमी है,, नए सौदे करना ,, व्यापार के नए प्रतिष्ठान स्थापित करना , दौड़ धूप तुमसे नही हो रहा है अतः तुम्हारा व्यवसाय तीन साल तक नुकसान में रहा है।'
'वही तुम्हारे पुत्र में उत्साह और जोश तो है लेकिन व्यापार में अभी उसे अनुभव की कमी है अतः वह दोगुना नुकसान कर बैठा है।'
'तुम्हारी समस्या का निदान यही है कि
पुत्र के हाथों में व्यापार को रहने दो और तुम एक *संरक्षक* की भांति उसे अपने अनुभव का लाभ देते रहो ताकि वह बड़ी गलतियों को करने से बचे।'
फिर उसका मित्र अपने घर चला जाता है।
और सचमुच कुछ वर्षो बाद पिता पुत्र का व्यवसाय लाभ में आकर उन्नति करने लगा।
निष्कर्ष यह है कि-
*युवा जोश और प्रौढ़ अनुभव का सामंजस्य कठिन से कठिन कार्य को सफलतापूर्वक कर सकती है* ।
धन्यवाद।।
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