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प्रायः बड़ो का हम चरण स्पर्श करते है, चरण स्पर्श करने का कारण बड़ो से आशीर्वाद प्राप्त करना,, उन्हें सम्मान देना है।
चूंकि जो बड़े है वे अधिक उम्र, अधिक अनुभव के कारण उन्हें हमारी अपेक्षा दुनिया की ज्यादा समझ होती है,,, समस्या से कैसे निपटें? उसकी समझ भी प्रायः उनमे ज्यादा होती है।
उनसे मार्गदर्शन लेने, सहयोग लेने, मुशीबत में हमे सहायता दे,, इस हेतु एक तरह से संरक्षक के रूप में बड़ो का उपयोगिता महत्वपूर्ण होती है।
अतः उन्हें आदर पूर्वक सम्मान देने के लिए अभिवादन सूचक तरीको का प्रयोग किया जाता है जैसे नमस्ते, प्रणाम, दण्डवत प्रणाम,राम राम इत्यादि।
प्रणाम या चरण स्पर्श में यदि बड़ी आयु के लोग हमारे रिश्तेदार या माता पिता जैसे पारिवारिक लोग हैं तब उनका चरण स्पर्श केवल सम्मान देने के लिए नही अपितु आत्मीयता के कारण भी किया जाता है।
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अब बात करते है छत्तीसगढ़ की जहां कुछ को छोड़कर अधिकांश जातियों में लोग *भांजे -भांजियों का चरण स्पर्श* किया जाता है।
भांजे-भांजी का चरण स्पर्श मामा-मामी करे कितना तर्कहीन है देखिये।
मामा शब्द में दो बार मा आया है यानी मामा को माँ से बढ़कर माना गया है, हालांकि माँ बढ़कर कोई नही होता,,, फिर भी *मामा- मामी को मां बाप के समकक्ष* माना जा सकता है।
अब बताइये कितने शर्म की बात है कि माँ बाप के समकक्ष माने जाने वाले मामा मामी से भांजे भांजी को चरण स्पर्श कराया जाना।
लगभग सभी भांजे मामा से आयु में छोटा होता है,अनुभव में छोटा, दुनिया की समझ कम तब मामा द्वारा भांजे को कौन सा सम्मान देना है जिसके कारण वह भांजे का चरण स्पर्श कर रहा है।
आत्मीयता का सम्बंध तो भांजे द्वारा मामा के चरण स्पर्श से भी हो सकता है।
कुछ लोग यह कहते हैं कि *भगवान राम का ननिहाल* छत्तीसगढ़ था,,कौशिल्या चंदखुरी(आरंग) की बेटी थी राम छग के लोगो का भांजा हुआ, इसलिए छग. के लोग सम्मान स्वरूप भांजे को प्रणाम करते हैं।
यह तर्क अभी का है यानी 4 - 5 साल पुराना,, यह किसी कट्टर रीति रिवाज समर्थक के द्वारा सोशल मीडिया में फैलाया गया तर्क है जिसमे कोई दम नही है...
...क्योंकि भांजे का चरण स्पर्श छग में काफी प्राचीन रिवाज लगता है जिसे *छत्तीसगढ़ के इतिहास के किसी भी पुस्तक या प्रमाण में भगवान राम से नही जोड़ा गया है।*
अर्थात लोग मनगढ़ंत ढंग से इस रिवाज को भगवान राम से जोड़ रहे है।ताकि इस गलत रिवाज को धार्मिक भावनाओं का बल मिले।
जबकि प्राचीन प्रमाणों में इस रिवाज का सम्बंध भगवान राम से हैं ही नही।
*ध्यान रहे मैंने भगवान राम, कौशिल्या, या छत्तीसगढ़ को उसका ननिहाल बताने वाले किसी भी तथ्य को मनगढ़ंत नही कहा है।*
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खैर अब चर्चा के दूसरे पहलू में आते है जहाँ पर कई जातियों में चाची एवं भाभी अपने भतीजे एवं देवर को प्रणाम करते हैं।
चाची आयु,अनुभव अन्य सभी बिंदुओं पर माँ के बराबर है वह बेटे रूपी भतीजे को प्रणाम करें यह कितना उचित है, आप खुद सोचिए।
वैसे ही भाभी को *भाभी माँ* भी कहा जाता है। परिवार में माता पिता के बाद बड़े भैया-भाभी को *दूसरा अभिभावक* माना जाता है,, तब भाभी द्वारा देवर का चरण स्पर्श कहाँ तक उचित है।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मामा-मामी द्वारा भांजे भांजी, चाची द्वारा भतीजे और भाभी द्वारा देवर का पैर स्पर्श करना नितांत ही अनुचित रिवाज है।
वैसे चाची द्वारा भतीजे और भाभी द्वारा देवर को प्रणाम करने का रिवाज तेजी से कम हो रहा है।
लेकिन भांजे-भांजी का चरण स्पर्श करने का प्रचलन लगभग ज्यो का त्यों है।
हमारी जाति में भी यह चलन है,, हालांकि मैंने व्यक्तिगत रूप से भांजे भांजी को प्रणाम करना बंद कर दिया है।
लेकिन *मजेदार बात यह है कि आज तक इस मुद्दे पर मुझसे एक भी व्यक्ति प्रेरित नही हुआ है।* 🙂🙂
बाकी पोस्ट जिसमे अलग अलग मुद्दे मैंने उठाये हैं उसमें कम या बहुत कम लोग प्रेरित हुए ,,, फिर भी कुछ तो प्रेरित हुए हैं
लेकिन भांजा भांजी चरण स्पर्श मुद्दे पर मैं पूरी तरह असफल रहा हूं यानी मेरी सफलता शून्य रही है,,
*उम्मीद है कि इस शून्य के पीछे काफी सारे शून्य लिख जाएंगे, फिर सामने में एक दो भी लिख जाये।*
धन्यवाद
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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