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एक जंगल में शेर रहता था। हर किसी से उसकी लड़ाई होते रहती थी।
पहले भालू , फिर हाथी, मगरमच्छ और आज तेंदुए से लड़ाई हुई।
भालू, हाथी, मगरमच्छ और तेंदुआ सभी एक जगह इकट्ठा हुए और उनमें सहमति बनी की वे एकसाथ मिलकर लड़ेंगे और शेर को हरायेंगे,,
फिर क्या था इस बार सभी मिलकर लड़े लेकिन आश्चर्य कि शेर ने उन्हें फिर भी हरा दिया।
कुछ दिनों के बाद लकड़बग्घे की एक झुँड का टकराव एक हिरण का शिकार करते वक्त शेर से हो गया।
शेर दहाड़ लगाते हुए लकड़बघ्घों से भीड़ गये,,काफी देर की छीना झपटी के बाद शिकार लकड़बघ्घों को हासिल हुआ,, और शेर पीछे हट गया।
एक तरह से यहाँ पर शेर की हार हुई और लकड़बघ्घों की जीत।
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क्या कारण है कि-
जिस शेर को जंगल के बड़े- बड़े महारथियों की आपसी एकता नही हरा पाई...
....उन्हें लकड़बघ्घों की मामूली झुँड ने परास्त कर दिया??
देखिए यह सच है कि एकता होने से बड़े से भी बड़ा काम आसानी से किये जा सकता हैं।
लेकिन एकता *बेमेल* नही होनी चाहिए,, हाथी, भालू, मगरमच्छ और तेंदुए की एकता खानपान, रहन सहन और प्रवृत्ति की दृष्टि से भिन्न थी।
अतः वे शेर को हराने के लिए एक दूसरों के गुण दोषों को भाँपकर कोई व्यवस्थित योजना नही बना पाये।
साथ ही *सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे सभी केवल इसलिए एक हुए थे कि शेर उसका दुश्मन हैं और उसे हराना है।*
अर्थात इनकी *एकता का उद्देश्य नकारात्मक* था जिसमे कोई सकारात्मक वस्तु की प्राप्ति नही होनी थी, बल्कि वे सभी शेर को हराकर अपने अहम को संतुष्ट करना चाहते थे।
जैसे वर्तमान सन्दर्भ में देखे तो पाकिस्तान और चीन दोनो की दोस्ती का आधार भारत से दुश्मनी है।
वही पर लकड़बग्घे सभी दृष्टि से समान थे,, एक दूसरे के गुणों से भलीभाँति वाकिफ थे अतः लड़ाई में सामूहिक शक्ति का सही प्रयोग करना वे अच्छे से जानते थे।
साथ ही उनकी एकता का उद्देश्य शेर को हराना या अपने को बड़ा साबित करना नही था, बल्कि शिकार को प्राप्त करना था।
यानी इनकी एकता सकारात्मक थी।
प्रसंग का सारांश यह है कि बेमेल एकता से पहले अपने लोगों में एकता हो ,,
साथ ही एकता का आधार *दुश्मन का दुश्मन दोस्त सिद्धांत* न होकर कुछ सकारात्मक पहलू को समेटे हुए हो तो और बढ़िया।
धन्यवाद।।
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