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फूलों के एक बग़ीचे में चारों ओर गुलाब ही गुलाब था। गुलाब के कारण बगीचा स्वर्ग के समान लग रहा था।
तभी मधुमक्खियों का झुँड गुलाब का रस लेने के लिए लपका। गुलाब ने कहा - 'हम मधुमक्खियों को कुछ नहीं देंगे' ,, और उन्हें झिड़ककर भगा दिया।
बगीचे से बाहर निकलते मधुमक्खियों की नजर एक किनारे में उगे धतूरे पर पड़ी,, वे उसके पास पहुंचे।
तभी धतूरे ने कहा - ' मैं अपने फूलों का रस देने को तैयार हूँ लेकिन उससे बने शहद पीकर कही कोई *पागल* न हो जाये'।
मधुमक्खियों ने धतूरे की बात समझी और खतरा भाँप कर वहाँ से चले गये।
कुछ समय बाद उस बगीचे में एक आयुर्वेदाचार्य पहुँचे,, उसे गुलाब के कुछ फूल लेने थे। गुलाबों ने अपने स्वभाव के अनुरूप उसे मना कर दिया।
निराश होकर बाहर जाते आयुर्वेदाचार्य की नजर भी धतूरे पर पड़ी। धतूरा सबकुछ देने को तैयार था लेकिन साथ ही अपने जहरीले गुण से भी उसे अवगत कराया।
आयुर्वेदाचार्य ने धतूरे के औषधीय गुणों को पहचानते हुए उससे दवाइयां तैयार की जिससे लोगो के कई असाध्य रोग ठीक हो गये।
अब धीरे -धीरे धतूरे की प्रसिद्धि बढ़ने लगी,, लोग उसे पवित्र मानने लगे। कुछ लोग धतूरे से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उसके फूल को *शिवजी के चरणों में अर्पित* कर दिये।
तातपर्य यह है कि *गुलाब के समान केवल गुण होना ही पर्याप्त नहीं है उस गुण का समाज की भलाई के लिए उपयोग होना भी जरूरी है।*
धतूरे के समान यदि आप को लगता है कि आप के पास कोई गुण नही है या केवल अवगुण है तब भी निराश न हो क्योंकि...
... पता नही कब आयुर्वेदाचार्य रूपी मार्गदर्शन से आप में ऐसे निखार आ जाये कि किसी बड़े और पवित्र कार्य मे अग्रणी भूमिका निभाते नजर आए।
धन्यवाद।।
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प्रेरणादायी रचना
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