एक विद्वान ने धर्म का बड़ा सुंदर परिभाषा दिया है, उसके अनुसार-
धर्म वह चीज है जिसे धारण किये बिना आप जिन्दा नहीं रह सकते। अर्थात सरल ढंग से समझे तो कोई व्यक्ति को अपने काम के प्रति इतना लगाव हो कि वह उसके बिना जी नहीं पाए तो वह काम ही उस व्यक्ति के लिए उसका धर्म है ।
उसने धर्म को भगवान या अध्यात्म से भी अलग बताया, खैर इस पर अलग से चर्चा हो सकती है। लेकिन मैं उसके इस बात से जरूर सहमत हूँ कि धर्म आप के अंदर उस वस्तु को जरूर खोजती है जो आपको जिन्दा रहने को प्रेरित करती है।
जब धर्म से हमे जीवन संबंधी प्रेरणा मिल रही है तो धर्म हमे कैसे अनैतिक बना सकता है।
वही जिसे दुनिया धर्म मानती है यानि हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आदि के संदर्भ में देखे तब भी धर्म लोगो को अनैतिक नहीं बनाती बल्कि धर्म के ठेकेदारों द्वारा धर्म की गलत व्याख्या लोगो को अनैतिक आचरण अपनाने को प्रेरित करती है।
धर्म अपने आप में बुरा नहीं है,
कहते है कि दुनिया में समझदार लोगो की कमी है, कुछ तो इसकी संख्या केवल 5 % बताते है, तब हम यह क्यों न माने कि लोग बड़ी संख्या में धर्म को गलत ढंग से समझेंगे और उसके अनुरूप अनैतिक कार्य करेंगे क्योंकि धर्म को कलिष्ट विषय बना दिया गया है जो आम जनमानस के समझ से ऊपर की बात प्रतीत होती है।
इस गलतफहमी के कारण लोग पथभ्रष्ट होकर कई बुराइयों में संलग्न हो जाते है, जो कि समाज में अलगाववाद, सम्प्रदायवाद, आतंकवाद, भाषायी संघर्ष व दंगो के रूप में परिलक्षित होती है।
धन्यवाद।
Good
जवाब देंहटाएंएकदम सही है
जवाब देंहटाएंसत्य वचन 👌
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