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आज से करोड़ो वर्ष पहले मानव जीवन की उत्पत्ति हुई।
तभी से मानव के अस्तित्व का आरम्भ मांना जाता है।
दिए गए प्रश्न की गूढ़ता को देखते हुए मै इसे दो भागो में बाँटना चाहूंगा क्योकि हम मानव अस्तित्व को समझे बिना उसकी प्रकृति को नहीं समझ सकते -
पहला - मानव का अस्तित्व क्या है ?
दूसरा- मानव के अस्तित्व की प्रकृति क्या है ?
मानव का अस्तित्व क्या है?🤔🤔
वास्तव में मानव के अस्तित्व के दो स्वरूप है -
1 . भौतिक स्वरूप -
मानव का भौतिक स्वरूप उसका शरीर है जो हमे दिखाई देता है।
2 . अभौतिक स्वरूप -
मानव का अभौतिक स्वरूप उसकी आत्मा है जो हमे दिखाई नहीं देती।
कुल मिलाकर
मानव का अस्तित्व उसके भौतिक और अभौतिक स्वरूप का मेल है जिसे हम शरीर और आत्मा के रूप में जानते है।
मानव के अस्तित्व की प्रकृति -
अब हम आते है प्रश्न के दूसरे भाग में कि -" मानव के अस्तित्व की प्रकृति क्या है? "
सर्वप्रथम हम जान लेते है कि किसी की प्रकृति क्या हो सकती है।
एक बिच्छू की स्वभाविक प्रकृति डंक मारने की, वही एक संत की प्रकृति दया भाव की होती है।
तब मानव की प्रकृति क्या हो सकती है , मानव की प्रकृति उसकेअस्तित्व के दो स्वरूपों में निहित होती है-
एक -
मानव के भौतिक स्वरूप या शरीर की प्रकृति संसारिक वस्तुओ के प्रति लगाव की होती है।
वह आचार विचार व्यवहार सहित सम्पूर्ण माया मोह से बंधा हुआ होता है। अर्थात शरीर की प्रकृति संसार से जुड़े रहने का है।
दो -
अभौतिक स्वरूप या आत्मा की प्रकृति संसारिक वस्तुओ , आचार , विचार व्यवहार से पूर्णतः अलगाव की होती है।
वह माया मोह के बंधन से बंधा हुआ नहीं होता , यानि आत्मा की प्रकृति निर्विकार होती है।
निष्कर्ष -
हम कह सकते है कि चूँकि
मानव का अस्तित्व उसके शरीर और आत्मा से मिलकर बना होता है अतः उसके अस्तित्व की प्रकृति उसके शरीर और आत्मा के अनुरूप ही निर्धारित होती है।
धन्यवाद🙏🙏🙏🙏
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Badhiya
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