# भीड़ # लघुकथा
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भीड़ को किसी दूसरे जनसभा में ले जाना था, इसके लिए एक नेता ने भीड़ को संबोधित किया। नेता ने ओजस्वी भाषण दिया और अंत मे लोगों की सहमति प्राप्त करने के लिए कहा - ' तो बताइये भाइयों और बहनों कौन-कौन सभा में चलना चाहेगा '
नेताजी को उम्मीद थी कि उसके तेजतर्रार भाषण से लोग खुद ही हाथ उठाकर जाने के लिए तैयार हो जायेंगे। लेकिन दो चार कार्यकर्ताओं को छोड़कर किसी ने भी हाथ नही उठाया,, नेताजी ने थोड़ा झेंपने के बाद फिर से अपनी बात दोहराई लेकिन नतीजा जस का तस रहा।
अब पास खड़े एक दूसरे नेता ने लोगों को सम्बोधित किया उसने भी उसीतरह का भाषण दिया और अंत में कहा - ' तो बताइए भाइयों और बहनों ऐसा कौन है जो उस सभा में नही जाना चाहेगा '
पहले की तरह इस बार भी भीड़ में किसी ने भी हाथ नही उठाई अर्थात सभा मे जाने को सभी लोग सहमत थे ऐसा भाव प्रकट हुआ।
कार्यकर्ताओं में जोश की लहर दौड़ गई वे भीड़ को पास में खड़े हुए बसों में बैठाने लगे।
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दरअसल इंसान की स्वभाविक प्रवृत्ति यह होती है कि वह भीड़ के साथ चलना चाहता है। लोग भीड़ से हटकर अपनी सहमति या असहमति प्रकट करने में संकोच करते है।
यही कारण है कि पहले नेता के भाषण के बाद लोग अपनी स्वीकृति प्रकट करने के लिए हाथ नही उठा पाये, वही दूसरे नेता के भाषण के बाद लोग अपनी अस्वीकृत देने के लिए भी हाथ नही उठा सके।
धन्यवाद 🙏🙏

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